घंटाघर की अनूठी घड़ी की कॉपी न हो इसलिए तब एक लाख रुपए देकर खरीदा था कॉपीराइट

सन् 1910 में राजा सरदार सिंह ने सरदार मार्केट बनवाया। चौपड़ की आकृति के बने इस मार्केट के बीचों-बीच 100 फीट ऊंचा…

सन् 1910 में राजा सरदार सिंह ने सरदार मार्केट बनवाया। चौपड़ की आकृति के बने इस मार्केट के बीचों-बीच 100 फीट ऊंचा घंटाघर बनवाया। यहां हाट बाजार में दूर-दूर से लोग खरीदारी करने आते थे। लाेगाें काे समय का पता चल सके इसलिए 1911 में लंदन की लुण्ड एंड ब्लोकली कंपनी से यहां घड़ी लगाई गई। तब इसकी लागत 3 लाख रुपए थी। एक लाख घड़ी की कीमत थी तो इतना ही खर्च इसे लगाने में हुआ। एक लाख में इसका कॉपीराइट खरीदा ताकि इसकी कॉपी न हो सके। यही कारण है कि ऐसी अनूठी घड़ी विश्व में सिर्फ दो जगह पर हैं।

1991 में खराब हो गई थी, कंपनी नहीं आई तो शहर के लुहार ने की ठीक

1991 में यह घड़ी खराब हो गई लेकिन कंपनी ने पार्ट्स न होने का कहते हुए इसे ठीक करने में असमर्थता दिखा दी। काफी कोशिशें हुईं पर घड़ी ठीक नहीं हुई। बाद में शहर के मो. अल्लाह नूर ने इसे ठीक करने का प्रस्ताव भिजवाया। दूसरी क्लास पास अल्लाह नूर ने खराब हो चुके घड़ी के बुश और कीरा फिर से हूबहू तैयार कर दिए और 26 अगस्त 1996 में यह घड़ी फिर से चालू हो गई। अब यही परिवार इस घड़ी की मेंटिनेंस कर रहा है।


अब

तब

{यह घड़ी अद्भुत इसलिए है क्योंकि हर 15 मिनट पर इसके 2 टंकाेरे बजते हैं। एक घंटे पर 8 बार ये टंकोरे बजते है अाैर फिर जितना समय हुआ है उतने ही घंटे के टंकोरे बजते हैं। विशेषता ये भी है कि इसमें हर घंटे के टंकोरे की आवाज अलग-अलग है।

{ऊपरी तीन मंजिलों में लगी इस घड़ी में हर शुक्रवार को चाबी भरी जाती है जो 10 किलाे की है। घड़ी के चारों डायलों का व्यास 6 फुट का है, इसमें बड़ी सुई 3 फुट और छोटी सुई 2 फुट की है, घड़ी पर कंपनी का नाम और निर्माण वर्ष भी लिखा है।

{अब 10 रुपए का टिकट लेकर अाप घंटाघर के ऊपर जाकर यह विशाल घड़ी कैसे काम करती है, यह जान सकते हैं।

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