जिस घर में गो माता की सेवा होती है वहां ईश्वर का वास होता है’

अंचल में जगह-जगह चल रही श्रीमद् भागवत कथा…

सीहोर. जिस घर में गौ माता की सेवा होती है, वहां ईश्वर का वास होता है। जो व्यक्ति गो माता की सेवा करता है, उन पर भगवान की सदैव कृपा बनी रहती है। यह बात ग्राम पालखेड़ी में आयोजित सात दिवसीय भागवत कथा के दूसरे दिन पं. अभिषेक भारद्वाज द्वारा उपस्थित श्रद्धालुओं से कही।

रविवार को भागवत कथा के दूसरे दिन पं. भारद्वाज ने कहा कि गाय पशु नहीं अपितु भारत का प्राण है। सनातन संस्कृति की दिव्य पहचान है। जिस घर में गो माता की सेवा सच्चे मन से की जाती है वहां भगवान कृष्ण कन्हैया का वास होता है।

गो माता का महत्व बताते हुए कहा कि गो माता गंदा जल पीकर भी गंगाजल सामान गोमूत्र देती है। इसके उपयोग से हमें अनेक बीमारियों से छुटकारा मिलता है। गोबर में लक्ष्मी जी का निवास होता है। प्रतिदिन गो माता की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। वहीं कष्टों का निवारण होता है।

उन्होंने आगे कहा कि श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करने और सुनने से असीम शांति का अनुभव होता है। भागवत कथा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनुराग भी उत्पन्न करती है।

कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भागवत कथा में भगवान के जिन रूपों व लीलाओं का वर्णन है, उन्हें यदि हम अपने जीवन में उतार लें तो हमारा जीवन सुखमय हो जाएगा। सभी लोग सांसारिक मोह माया के बंधन से छूटकर जीवन की सत्यता को जान पाएंगे।

श्रीमद् भागवत कथा हमें मोहमाया के बंधन से मुक्त कराती है और बोध कराती है कि किस उद्देश्य के लिए हमारा जन्म हुआ है। जिस भी क्षेत्र में भागवत कथा होती है वहां का वातावरण सकारात्मक रहता है और नकारात्मकता नहीं रहती। ग्राम पालखेड़ी में जारी सात दिवसीय भागवत कथा में मंगलवार को कथा के चौथे दिवस भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा।

परोपकार से बढ़ा कोई पुण्य नहीं : शर्मा
18 पुराणों में 6 शास्त्र और 4 वेदों में एक ही बात लिखी है कि परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नही है और दूसरों को दु:ख देने से बड़ा कोई पाप नही है। यह बात ग्राम माथनी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन कथा के दैरान पं. रघुनंदन शर्मा ने कही।

उन्होंने आगे कहा कि जब राजा रहूगण सत्संग में ज्ञान प्राप्त करने जा रहे थे तो पालकी में लगे एक कहार के बीमार होने पर महाराज जड़भरत को पालकी में लगाया गया, तब पालकी उठाए हुए भी महाराज जड़भरत एक धनुष आगे की भूमि देखते हुए चलते थे, क्योंकि उनका भाव यही था की किसी भी जीव को मेरे द्वारा कोई कष्ट न हो जाए, क्योंकि वह हर जीव में परमात्मा का स्वरूप ही देखते थे।

उनका भाव ही यही था कि किसी भी जीव को मत सताओं, परहित में ही मेरा जीवन लगा रहे और राजा रहूगण को उपदेश देकर उसका उद्धार किया। हमें भी अपने जीवन में परोपकार करते हुए जीवन जीना चाहिए।

क्रोध और विरोध एक दूसरे के पूरक : मुनिश्री
मुनि श्री विनिशचल सागर महाराज साहब ससंघ ने शाक को इंदोर नाके पर मंगल प्रवेश किया जहां समाज जन ने अगवानी की। श्री पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर छावनी में मुनिश्री ने अपने आशीष वचन में श्रावक श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि क्रोध आत्मा की प्रकृति नहीं बल्कि क्रोध आत्मा की विकृति है। विकृति के द्वारा आत्मा कभी भी अपनी संस्कृति की ओर अग्रसर नहीं हो सकती है। क्रोध में कभी शोध नहीं होता।

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