इंटरव्यू / टोक्यो ओलंपिक के लिए ऐश्वर्य प्रताप को तराश रहीं सुमा शिरूर, 10 मीटर एयर राइफल में विश्व रिकॉर्ड बना चुकी हैं

मप्र शूटिंग अकादमी की चीफ कोच सुमा ने बताया- शादी और बच्चा होने के बाद मेरा कॅरियर शुरू हुआहर जंग में जीत के लिए परिवार का सपोर्ट जरूरी, ये मुझे भी मिला और अब ऐश्वर्य को भी मिल रहा है

भोपाल (सुमित पांडेय). कॉमनवेल्थ गेम्स 2002 मैनचेस्टर और 2010 नई दिल्ली में 10 मीटर एयर राइफल का गोल्ड जीतने वाली शूटर सुमा शिरूर मप्र शूटिंग अकादमी की चीफ कोच हैं। वह ओलंपिक के लिए ऐश्वर्य प्रताप को तैयार कर रही हैं। ऐश्वर्य को ओलंपिक का टिकट मिला हैं। सुमा बताती हैं जीत के लिए परिवार का सपोर्ट बहुत जरूरी है। मेरा असल कॅरियर तो बच्चा होने के बाद शुरू हुआ।मुझे परिवार का सपोर्ट मिला है और ऐश्वर्य को भी मिल रहा है।

शुक्रवार को कंगना रनोट की पंगा फिल्म रिलीज हो रही है, यह फिल्म भी परिवार के सपोर्ट से एक कबड्‌डी खिलाड़ी की सफलता पर बनी है।सुमा शिरूरजूनियर नेशनल शूटिंग टीम की हाई परफार्मेंस कोच भी हैं। इनका नाम इस बार के पद्म पुरस्कारों की महिला खिलाड़ियों की सूची में शामिल है। उन्होंने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अपने संघर्ष और जिद की कहानीसुनाई …

अपार भीड़ के बीच बच्चे को ढूंढ रही थीं आंखें
सुमा शिरूर ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2002 में अंजलि भागवत के साथ देश को पहली बार महिला शूटिंग में गोल्ड जिताया था। तब देश ने उन्हें सर आंखों पर बिठा लिया था। वह कहती हैं- “देश के लिए गोल्ड जीतकर लौटी तो छह महीने के बच्चे को छोड़े हुए करीब तीन हफ्ते हो गए थे। मुंबई एयरपोर्ट पर हजारों लोग हमारा स्वागत करने आए थे, लेकिन मेरी आंखें केवल मेरे बच्चे को ढूंढ़ रही थीं। जब मैंने उसे सासु मां की गोद में देखा तो आंखें भर आईं। बेटे निहाल को गले से लगा लिया और गोद में लेकर उसके हाथ में तिरंगा दे दिया। वह तिरंगा लहराने लगा। सुबह के अखबारों में यही फोटो छपा। वह मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था।”मैनचेस्टर से गोल्ड मेडल जीतकर लौटीं सुमा शिरूर बच्चे को गोद में उठाए हुए। बच्चे के हाथ में तिरंगा।

कॉमनवेल्थ गेम्स सिर पर थे और मुझे बच्चा हुआ
सुमा कहती हैं, “मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए कुछ माह बाकी थे और मुझे बच्चा हुआ था। ये मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण समय था। मैं हर पल सोचती रहती थी कि अब क्या होगा। शूटिंग छोड़ना पड़ेगा क्या ? लेकिन शूटिंग मेरा जुनून था। इसे मैं किसी कीमत पर नहीं छोड़ सकती थी। इस दौरान पति सिद्धार्थ ने बहुत सपोर्ट किया।” उन्होंने कहा- ‘तुम चिंता मत करो, बच्चा हो गया तो क्या हुआ। अब तुम देश के लिए मेडल भी जीतोगी।’ उनके ये शब्द मेरा उत्साह बढ़ाने वाले थे।

सुमा कहती हैं कि, “वो मेरे कॅरियर का बेस्ट टाइम था। यहां मैं रुकती तो फिर आगे बढ़ना मुश्किल था। मेरी सास मां ने कहा- मैं बच्चे का देखभाल करूंगी तुम शूटिंग ट्रेनिंग के लिए जाना शुरू करो। मैंने डिलीवरी के एक महीने बाद ही शूटिंग शुरू कर दी। सही मायने में मेरा कॅरियर ही शादी और बच्चा होने के बाद शुरू हुआ।”सुमा शिरूर ने 2010 में नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड मेडल जीता था।

एक रायफल से पांच लड़कियां निशाना लगाती थीं
2018 तक प्रोफेशनल शूटिंग करने वाली सुमा कहती हैं, “पंगा हर रोज लेना पड़ता था। शूटिंग के लिए, अपने हथियारों के लिए। जब लोग पूछते थे क्या करती हो तब लोगों को समझाना बहुत मुश्किल होता था। देश के कम ही लोग जानते थे कि शूटिंग ओलंपिक खेलों में शामिल है। हमारे पास ट्रेनिंग के लिए रायफलें नहीं होती थीं। जर्मनी से रायफलें मंगाईं जाती थीं, वह 5 साल में आती थीं। एक रायफल से 5 खिलाड़ी ट्रेनिंग करते थे। 2004 में राज्यवर्धन सिंह ने जब ओलंपिक में मेडल जीता तो लोगों को पता चला कि शूटिंग में भी मेडल आ सकते हैं।”मप्र शूटिंग अकादमी की चीफ कोच सुमा शिरूर मप्र को ओलंपिक कोटा दिलाने वाले ऐश्वर्य प्रताप सिंह के साथ।

टोक्यो ओलंपिक में दो-तीन इवेंट में मेडल पक्के
जूनियर नेशनल शूटिंग टीम की हाई परफार्मेंस कोच सुमा शिरूर कहती हैं कि टोक्यो ओलंपिक में दो-तीन इवेंट में मेडल पक्के हैं। यूं तो कई खिलाड़ी हैं, जो मेडल दिलाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा संभावनाएं ऐश्वर्य,मनु भाकर और सौरभ चौधरी की हैं, जिन्होंने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई करने वाले ज्यादातर शूटर्स ने विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में पदक जीते हैं।

मप्र शूटिंग अकादमी भोपाल में ट्रेनिंग सेशन के दौरान चीफ कोच सुमा शिरूर।

मप्र शूटिंग अकादमी भोपाल में ट्रेनिंग सेशन के दौरान चीफ कोच सुमा शिरूर।

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