सेना में स्थाई कमीशन: वो महिला सैनिक जिनकी कहानी सुनकर सुप्रीम कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला

केंद्र सरकार (Central Government) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में महिलाओं को स्थायी कमीशन नहीं देने को लेकर कई दलीलें दीं वहीं सरकार के विरोध में महिला सैनिकों की बहादुरी के किस्से भी सुनाए गए. कोर्ट ने 10 महिलाओं के जज्बे की कहानी सुनी

नई दिल्ली. सैन्य बलों में लैंगिक भेदभाव खत्म करने पर जोर देते हुये सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सेना में महिला अधिकारियों के कमान संभालने का मार्ग प्रशस्त कर दिया और केन्द्र को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर सारी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाये. सुप्रीम कोर्ट में यह लड़ाई करीब नौ साल तक चली. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं को स्थायी कमीशन नहीं देने को लेकर कई दलीलें दीं वहीं सरकार के विरोध में महिला सैनिकों की बहादुरी के किस्से भी सुनाए गए. कोर्ट ने 10 महिलाओं के जज्बे की कहानी सुनी-

मेजर मिताली मधुमिता- मेजर मिताली मधुमिता सेना मेडल पाने वाली पहली महिला आर्मी अफसर थीं. उन्होंने 26 फरवरी 2010 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए आतंकी हमले के दौरान कई लोगों की जान बचाई. मिताली वहां इंग्लिश लैंग्वेज के लिए बनी एक ट्रेनिंग टीम हेड कर रही थीं. हमले की जानकारी मिलते ही वह घटनास्थल पर पहुंचीं. हालांकि उस वक्त अफगान फोर्स ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो वह गाड़ी छोड़कर पैदल की लोगों की मदद के लिए पहुंचीं. घटनास्थल से उन्होंने लोगों को बचाया और अस्पताल पहुंचाया. इसके बाद वह उन्हें भारत भेजने के प्रयासों में लगी रहीं. अपनी इसी बहादुरी के लिए 2011 में उन्हें सेना मेडल दिया गया. मिताली यह सम्मान पाने वाली पहली महिला अफसर हैं.

स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल- युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित पहली महिला अफसर मिंटी इंडियन एयरफोर्स में फायटर कंट्रोलर के तौर पर कार्यरत हैं. पिछले साल 27 फरवरी को हुई बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद जब पाकिस्तान के लड़ाकू विमान भारत की सीमा में घुसे थे तो मिंटी ने ही उन्हें भारतीय सीमा से खदेड़ दिया था. मिंटी को इस उपलब्धि के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अगस्त 2019 में युद्ध सेवा मेडल से नवाजा था. बालाकोट एयरस्ट्राइक के दौरान मिंटी का काम पायलट को दुश्मन विमानों की सटीक लोकेशन मुहैया कराना था.

गुंजन सक्सेना- फ्लाइट अफसर गुंजन ऐसी पहली भारतीय महिला थीं जिन्होंने युद्ध प्रभावित क्षेत्र में उड़ान भरी थी. कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध प्रभावित क्षेत्र में जरूरी सामान पहुंचाने के साथ-साथ घायल सैनिकों को रेस्क्यू करने जैसा महत्वपूर्ण काम किया था. गुंजन शौर्य वीर अवॉर्ड से सम्मानित पहली महिला अफसर थीं. उनकी बहादुरी के लिए राष्ट्रपति ने उन्हें ये सम्मान दिया था.

दिव्या अजीत कुमार- स्वॉर्ड ऑफ ऑनर हासिल करने वाली पहली महिला अधिकारी दिव्या अजीत कुमार 21 साल की उम्र में 244 पुरुष और महिला साथियों को पछाड़ कर बेस्ट ऑलराउंड कैडेट बनी थीं. भारतीय थल सेना के इतिहास में पहली बार किसी महिला ने यह उपलब्धि हासिल की थी. कैप्टन दिव्या 2010 में आर्मी एयर डिफेंस कॉर्प्स में शामिल हुईं थीं. 2015 में उन्हें गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सेना की सभी महिला टुकड़ियों का नेतृत्व करने के लिए भी चुना गया था.इसके अलावा नौसेना की 6 महिला अफसरों की टीम 10 सितंबर 2017 को समुद्र के रास्ते दुनिया नापने निकली थी. लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी की अगुवाई में टीम 55 फीट की बोट आईएनएस तारिणी पर निकली थी. इस टीम ने 194 दिन में 26 हजार समुद्री मील का सफर तय किया था. इस टीम में लेफ्टिनेंट कमांडर पायल गुप्ता, लेफ्टिनेंट कमांडर पी स्वाति, लेफ्टिनेंट कमांडर विजया देवी, लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी, लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतिभा जामवाल, लेफ्टिनेंट कमांडर ऐश्वर्या बोड्डापटी शामिल थीं.

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