दिल्ली दंगे के 30 दिन पूरे / कोरोना की वजह से राहत शिविर खाली हो रहा, पर लोग अपने घरों में लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे

दिल्ली के उन्हीं इलाकों से रिपोर्ट जहां 53 जानें गई थीं. पुराना मुस्तफाबाद। इस इलाके में कब्रिस्तान से बिल्कुल सटी हुई एक ईदगाह है। यह ईदगाह बीते एक महीने से ऐसे सैकड़ों लोगों की पनाहगाह बनी हुई है, जो फरवरी में यहां भड़के दंगों के दौरान बेघर हो गए थे। ऐसे लोगों को आश्रय देने के लिए तब दिल्ली सरकार और वक्फ बोर्ड ने मिलकर ने इस ईदगाह में राहत शिविर स्थापित किया था। दिल्ली में हुए दंगों को अब एक महीना पूरा हो चुका है। लेकिन इस राहत शिविर में पनाह लेने वाले कई शरणार्थी अब तक भी अपने घर वापस लौटने की स्थिति में नहीं आ सके हैं। अब कोरोना की महामारी के चलते जब पूरे देश में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन घोषित हो चुका है तो इस राहत शिविर को भी खाली करवाया जा रहा है। ऐसे में यहां रह रहे तमाम लोगों की स्थिति कोढ़ में खाज जैसी बन पड़ी है।


इस राहत शिविर में रहने वाले अधिकतर लोगों के घर इस कदर जल चुके हैं कि रहने लायक नहीं बचे हैं। कुछ लोगों ने तो बीते दिनों में किराए के मकान खोज लिए हैं, लेकिन अब कोरोना के डर से अधिकतर मकान मालिक भी अपने मकान किराए पर देने में घबरा रहे हैं। ऐसे में यहां रह रहे दंगा पीड़ित अब खुद भी नहीं जानते कि अगर उन्हें इस राहत शिविर से भी निकाल दिया गया तो वे कहां जाएंगे। मुस्तफाबाद के बीचों-बीच स्थित ये राहत शिविर कई त्रासद कहानियां समेटे हुए है। हालांकि पहली नजर में देखने पर यहां का माहौल किसी मेले जैसा नजर आता है। बड़े-बड़े रंग-बिरंगे तंबू, लाइन से लगी कैनोपी, हर कैनोपी के बाहर भीड़ लगाए खड़े लोग, जगह-जगह तैनात नागरिक सुरक्षा के जवान, रंग-बिरंगे पुराने कपड़ों के ढेर, उसके आस-पास दौड़ते छोटे बच्चे और बच्चों का पीछा करती उनकी माएं।

ईदगाह राहत शिविर में मौजूद दंगा पीड़ित। कोरोनावायरस की वजह से यह शिविर अब बंद किया जा रहा है।
ऊपर-ऊपर से खुशनुमा दिखता यह माहौल असल में कितना त्रासद है, इसका अहसास थोड़ा भी नजदीक से देखने पर आसानी से हो जाता है। इस राहत शिविर में लगी सबसे पहली कैनोपी ‘डॉक्टर्स यूनिटी वेलफेयर एसोशिएशन’ की है जहां पीड़ितों के लिए दवाएं रखी गई हैं। दंगों में चोटिल कई लोग यहीं अपनी मरहम-पट्टी करवाते देखे जा सकते हैं। इसके ठीक बगल में दिल्ली पुलिस का स्टॉल है, जहां शिकायत दर्ज करवाने के लिए अब भी दर्जनों लोग बार-बार चक्कर लगा रहे हैं। यही स्थिति बाल अधिकार संरक्षण आयोग, विधिक सेवा प्राधिकरण और अल्पसंख्यक आयोग के स्टॉल्ज की भी हैं, जहां लोग कतार लगाए अपनी-अपनी आपबीती दर्ज करवा रहे हैं।

दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट भाग-1 : जिनके आशियाने जल गए, उनके पास जमा-पूंजी के नाम पर अब जले हुए नोट ही बाकी रह गए
पीड़ितों की पहचान के लिए हाथ में बैंड
राहत शिविर में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में कपड़े का एक बैंड बंधा है ताकि उनकी पहचान आसानी से की जा सके। कुछ लोग यहां ऐसे भी हैं जो इस राहत शिविर में रह नहीं रहे, लेकिन अपनी शिकायतें दर्ज करवाने यहां पहुंचे हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति 58 साल के मोहम्मद फतेह आलम भी हैं जो बिहार से आए हैं। हाथों में अपने जवान बेटे की तस्वीर लिए फतेह आलम एक स्टॉल से दूसरे स्टॉल पर भटक रहे हैं, ताकि उनकी शिकायत दर्ज हो सके और उनके बेटे की कोई खबर उन्हें मिल सके।

फतेह आलम का बेटा करीब छह महीने पहले बिहार से दिल्ली आया था और यहां फल बेचने का काम किया करता था। फतेह बताते हैं, ‘मेरा बेटा फिरोज जबसे दिल्ली आया था मेरी उससे कोई बात नहीं हुई थी। वो कभी फोन नहीं करता था। लेकिन ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था कि दंगों में उसे कुछ हो गया है। बीती 16 मार्च को हम बिहार में ही थे जब हमारे भतीजे के फोन पर दिल्ली दंगों में मारे गए कुछ लोगों की तस्वीरें आई। उनमें फिरोज की भी तस्वीर थी। भतीजे ने मुझे ये तस्वीर दिखाई तो हम लोग उसी रात ट्रेन पकड़ कर दिल्ली चले आए। पहले सीधा अस्पताल गए थे लेकिन वहा से कोई जानकारी नहीं मिली। फिर उन्हीं लोगों ने हमें यहां कैंप में भेज दिया।’

दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण के शिवेन वर्मा ने फतेह आलम की यह पूरी आपबीती सुनने के बाद उनके लिए एक प्रार्थना पत्र तैयार किया। इस पर अंगूठा लगाकर फतेह ने यह प्रार्थना पत्र दिल्ली पुलिस को दे दिया। लेकिन कुछ दिन बाद ही दिल्ली पुलिस ने फतेह को जवाब दे दिया कि उनके बेटे की कोई भी जानकारी नहीं मिल पा रही है। फतेह ये भी नहीं जानते कि उनका बेटा कब और किस इलाके में मारा गया। उनके पास सिर्फ एक तस्वीर है, जिसमें उनका मृत बेटा जमीन पर गिरा हुआ दिख रहा है। यही तस्वीर लेकर फतेह बिहार से दिल्ली अपने बेटे का पता लगाने आए थे। लेकिन दिल्ली पुलिस की दो टूक सुनने के बाद वो बैरंग ही बिहार लौट चुके हैं।

फतेह आलम, जिनका बेटा दंगों में मारा गया।
वापस लौटने का खयाल भी जिन्हें डरा देता है
फतेह आलम तो अपनी लाचारी लेकर वापस अपने घर लौट गए, लेकिन राहत शिविर में रह रहे कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें वापस घर लौटने का खयाल भी बेहद डरा देता है। 38 साल के निजामुद्दीन ऐसे ही एक व्यक्ति हैं जो अब कभी वापस अपने मोहल्ले नहीं लौटना चाहते। व्हील चेयर पर बैठे निजामुद्दीन के दोनों हाथों में प्लास्टर लगा हुआ है और पैरों में भी पट्टी बंधी है। वो बताते हैं, ‘उस रोज हम गांव से वापस लौट रहे थे। मेरे साथ मेरा छोटा भाई जमालुद्दीन भी था। हम लोग अपने मोहल्ले से बमुश्किल दो गली दूर थे जब दंगाइयों हमें घेरकर मारना शुरू कर दिया। मेरे दोनों हाथ टूट गए, दोनों में रॉड पड़ी है, पैर की हड्डी भी टूट चुकी है और सिर पर कई टांके लगे हैं। मेरे छोटे भाई की तो दंगाइयों ने पीट-पीट कर हत्या ही कर दी। जहां इतना कुछ हुआ अब वापस वहीं रहने कैसा जा सकता हूं।’

निजामुद्दीन, जिनके दोनों हाथों में प्लास्टर है।
बेटा घर जाने की बात से घबरा जाता है
वापस न लौट पाने का ऐसा ही डर शिविर में रह रहे 78 साल के मुन्ने खान से लेकर 14 साल के अयान तक के मन में बैठ गया है। अयान की बड़ी बहन शाहीन जब एकदम सधी हुई अंग्रेजी में पत्रकारों के हर सवाल का जवाब देती है, तो उसके पिता शान मोहम्मद की आंखों में बेटी पर गर्व करने की चमक साफ झलकने लगती है। लेकिन उनकी आंखों की यह चमक जल्द ही उन आंसुओं में घुलकर गायब हो जाती है जो अपने बेटे के बारे में बताते हुए उनकी आंखों में भर आए हैं। शान मोहम्मद कहते हैं, ‘दंगों के कुछ दिनों अयान की मां मोहल्ले के बाकी लोगों के साथ अपने घर की स्थिति देखने गई थी। अयान भी उसके साथ था। लेकिन जैसे ही वो वहां पहुंचा वो बेहद घबरा गया। उसके मन में ऐसा डर बैठ गया है कि वो अब भी कई बार घबराने लगता है और घर जाने के नाम से भी उसकी तबियत बिगड़ने लगती है। हम दिमाग के डॉक्टर को भी दिखा रहे हैं, लेकिन उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं है।’

दंगों की भयानक याद से जुड़े डर और दहशत के अलावा कई लोग इसलिए भी वापस अपने घर नहीं लौट रहे, क्योंकि उन्हें लग रहा है पुलिस उन्हें किसी भी मामले में आरोपी बना सकती है। विशेष तौर से जवान लड़कों को डर है कि पुलिस उन्हें किसी भी मुकदमे फंसाकर गिरफ्तार कर सकती है। इसलिए इन लड़कों को शिविर में सबके साथ रहना ज्यादा सुरक्षित महसूस करवा रहा है।

दिल्ली में दंगों के एक महीने बाद राहत शिविर से घर लौटते लोग।
भाजपा नेता का फोन पर जाने पर पुलिस ने लड़के को छाेड़ा
इस शिविर में ही रहने वाले 24 साल के अबू बकर को कुछ दिनों पहले पुलिस तब अपने साथ ले गई थी जब वो अपने घर की स्थिति देखने अपने मोहल्ले गए थे। अबू बताते हैं, ‘पुलिस ने मुझसे कहा कि चलो तुम्हें एसीपी साहब ने बुलाया है। उन्होंने मुझसे और कुछ नहीं कहा और मुझे खजूरी ख़ास थाने में सात घंटों तक रखा गया। इस दौरान पुलिस मुझे कई वीडियो दिखाती रही और पीट-पीट कर वीडियो में दिख रहे लोगों को पहचानने को कहती रही।’ अबू आगे कहते हैं, ‘पुलिस ने मुझे किसी को फोन तक नहीं करने दिया। वो तो मुझे लेकर जाते हुए एक दोस्त ने देख लिया था तो उसने मेरे भाई को बताया। फिर भाजपा के एक बड़े नेता के कहने पर मुझे छोड़ा। मैं खुद भी पहले भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे में रह चुका हूं। मुझे तो पुलिस ने ऊपर से फोन आने के बाद छोड़ दिया लेकिन बाकी लड़कों को घर लौटने में यही डर है कि उन्हें फंसा दिया जाएगा। सबकी तो पहचान होती नहीं नेताओं तक।’

वैसे ईदगाह राहत शिविर में रहने वाले कई कुछ लोग वापस अपने घरों में लौट भी चुके हैं। इनमें अधिकतर वे लोग हैं जिनके घरों में लूटपाट तो हुई है लेकिन जलाए नहीं गए हैं। जिन लोगों के घर जल चुके हैं, उनके वापस न लौटने का एक कारण ये भी है उन्हें अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। कई लोगों को लगता है कि पूरा भुगतान होने से पहले शायद एक बार फिर सरकार उनके घर का मुआयना कर सकती है। लिहाजा अगर उन्होंने पहले ही घर की मरम्मत करवा दी कहीं उनका भुगतान करने से सरकार इनकार न कर दे।

लोग अपने घरों पर रुकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे
जिन लोगों को मुआवजा मिल चुका है, वे लोग वापस अपने घर लौट भी रहे हैं। शिव विहार के ही रहने वाले महेंद्र कुमार रुप्पल का घर भी दंगाइयों ने पूरा फूंक डाला था। लेकिन वे अब अपने घर लौट चुके हैं और धीरे-धीरे घर की मरम्मत भी करवा रहे हैं। उनको दो किस्तों में ढाई लाख रुपए का मुआवजा अब तक मिला है। दंगा प्रभावित कई लोग ऐसे भी हैं जो रात को तो अपने घरों पर रुकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे लेकिन सरकारी अधिकारियों की राह देखते दिन-दिन भर घरों के आस-पास ही रहने लगे हैं।

महेंद्र कुमार रुप्पल, जिनका घर दंगों में जल गया।
शिव विहार की गली नंबर 19 में कई लोग अब वापस अपने घरों में लौट चुके हैं। लेकिन यहां हुई आगजनी में जिन घरों को ज्यादा नुकसान पहुंचा है उनके लिए वापस लौट पाना फिलहाल मुमकिन नहीं है। मोहम्मद इस्लाम खान भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं जिनके घर बुरी तरह जल चुके हैं। इस्लाम के पड़ोस में रहने वाले कमलेश, सत्यपाल और राजेश कुमार के घरों में आग नहीं लगी लेकिन इन सभी घरों में पानी इस्लाम के घर पर लगी मोटर से ही आता था। लिहाजाये तामाम लोग भी फिलहाल वापस अपने घर नहीं लौट पा रहे हैं, क्योंकि इनके घर भले ही सुरक्षित हैं लेकिन इस्लाम का घर जल जाने के कारण इनके घरों भी पानी की समस्या पैदा हो गई है।

तमाम कारणों से अपने घर वापस न लौट पाने वाले दंगा पीड़ित अब तक राहत शिविर में किसी तरह अपना गुजारा कर रहे थे। लेकिन कोरोना के चलते अब राहत शिविर में भी इन लोगों को ज्यादा दिनों तक पनाह मिलने की गुंजाइश खत्म होने लगी है। इस राहत शिविर की जिम्मेदारी सम्भाल रहे हाजी नईम मालिक कहते हैं, ‘राहत शिविर हमेशा के लिए तो नहीं था। आज नहीं तो कल आज सब लोगों वापस तो लौटना ही पड़ेगा। हम किसी को अभी यहां से जबर्दस्ती नहीं हटा रहे लेकिन सबसे ये जरूर कह रहे हैं कि जितनी जल्दी लोग व्यवस्था कर लें उतना बेहतर है। हम घर ढूंढने में भी लोगों की मदद कर रहे हैं और राहत शिविर से अपने घर जा रहे लोगों को एक महीना का राशन, चारपाई, बिस्तर आदि भी उपलब्ध करवा रहे हैं। कोरोना के चलते जैसी स्थितियां बन रही हैं, उनमें यही इकलौता विकल्प है कि राहत शिविर से सभी लोग जल्द से जल्द किसी ऐसी जगह रहने पहुंच जाएं जहां आने वाले लंबे समय तक वो सुरक्षित रह सकें।’

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