कोरोना: इस जर्मन वैज्ञानिक की बात नहीं मानने का खामियाजा उठा रहा है अमेरिका!

जर्मन वैज्ञानिक ऑलफ़र्ट लैंट सबसे पहले कोरोना की टेस्ट किट तैयार करने के काम पर लग गए थे. ऑलफ़र्ट और उनकी टीम ने 9 जनवरी को ही कोरोना की ऐसी टेस्ट किट तैयार कर ली थी जो कि 24 घंटे में नतीजे देने में सक्षम है.

वाशिंगटन. अमेरिका (USA) में बीते तीन दिनों से हर रोज़ 10000 से ज्यादा कोरोना वायरस (Coronavirus) संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं. यहां 54000 से ज्यादा केस सामने आ चुके हैं जबकि 782 लोगों की इस संक्रमण से मौत हो चुकी है. अब एक जर्मन वैज्ञानिक से दावा किया है कि उन्होंने जनवरी में ही सिर्फ 24 घंटे में कोरोना का टेस्ट करने वाली किट तैयार कर ली थी लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन (Britain) जैसे देशों ने उनकी एक नहीं सुनी और आज बुरा नतीजा झेल रहे हैं.



CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक जर्मन वैज्ञानिक ऑलफ़र्ट लैंट 30 साल से वायरस के बारे में ही अध्ययन कर रहे हैं और सार्स (Severe acute respiratory syndrome) जैसी बीमारी का पता लगाने में भी उनकी अहम भूमिका रही है. चीन में कोरोना के मामले सामने आने बाद ऑलफ़र्ट सबसे पहले इसकी टेस्ट किट तैयार करने के काम पर लग गए थे. ऑलफ़र्ट और उनकी टीम ने 9 जनवरी को ही कोरोना की ऐसी टेस्ट किट तैयार कर ली थी जो कि 24 घंटे में नतीजे देने में सक्षम है. ये किट कोरोना फैमिली के वायरस से होने वाले सभी संक्रमण के लिए कारगर है जिनमें सार्स और Covid19 भी शामिल है.

WHO ने भी टेस्ट किट को मान्यता दी
ऑलफ़र्ट बताते हैं कि 11 जनवरी को इस किट की जांच के लिए उन्होंने इसे ताइवान सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल भेजा था. एक हफ्ते से कम में वहां से उन्हें जवाब मिल कि ये काम करने लायक हैं और इसे लेबोरेट्री में इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके बाद 17 जनवरी को WHO ने भी अपनी वेबसाइट पर ऑलफ़र्ट के इस टेस्ट से जुड़ी जानकारियां अपनी वेबसाइट पर साझा कीं. ऑलफ़र्ट के मुताबिक इस एक किट की कीमत 173 डॉलर है और इससे 100 लोगों का टेस्ट किया जा सकता है. सऊदी अरब, साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, और यूरोप के कई देशों ने ऑलफ़र्ट 40 लाख से ज्यादा टेस्ट किट फरवरी में ही खरीद ली थीं.

अमेरिका और ब्रिटेन ने नहीं दिया ध्यान!
कोरोना वायरस से निपटने की बात करें तो WHO के डायरेक्टर टेडरॉस बार-बार कहते रहे हैं कि जो देश जितने ज्यादा लोगों का टेस्ट करेगा, उतनी जल्दी ही इस संक्रमण को काबू कर पाएगा. उधर 17 जनवरी को कि लैंट प्रोटोकॉल किट WHO ने सभी देशों को इस्तेमाल करने की सलाह जारी कर दी थी. इसके बावजूद अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (CDC) ने इस सलाह को टालते हुए अपनी किट बनाने की घोषणा की.

इस किट को बनाने में WHO के निर्देशों का पालन भी नहीं किया गया. CDC ने 5 फरवरी को ऐलान किया कि किट बन गयी हैं और लेबोरेट्री भेजी जा रहीं हैं लेकिन अगले ही दिन से कई देश भर से इन किट में खराबी और सही नतीजे नहीं आने की शिकायतें आने लगीं. इसके बाद अफरा-तफरी की स्थिति बन गयी और CDC नहीं बताया पाया कि आखिर टेस्ट किट में आया रही गड़बड़ी से कैसे निपटा जाए.

इसके बाद खासकर अमेरिका और ब्रिटेन में स्थिति बिगड़ गयी और हजारों नए मामले सामने आने लगे, जिसका सीधा संबंध टेस्ट नहीं होने से जोड़ा जा रहा है. उधर CDC और उप राष्ट्रपति माइक पेंस भी टेस्टिंग का अलग-अलग आंकड़ा देते रहे. पेंस के मुताबिक अमेरिका में 254000 लोगों का टेस्ट किया जा चुका है जबकि CDC की वेबसाइट के मुताबिक ये आंकड़ा सिर्फ 72,818 ही है. जबकि इसके मुकाबले साढ़े तीन लाख की जनसंख्या वाले आइसलैंड जैसे छोटे देश ने 21 मार्च तक देश 10 हज़ार लोगों का टेस्ट कर लिया था. अब हालत ये है कि जहां न्यूजीलैंड में कुल टेस्ट में से 1 से 2% लोग कोरोना पॉजिटिव हैं वहीं यूके में आंकड़ा 5% जबकि अमेरिका में 13% पहुंच गया है.

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