जानें महात्‍मा गांधी ने 102 साल पहले ऐसे दी थी दुनिया की सबसे बड़ी महामारी को मात

Coronavirus: इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है. ये पहली बार नहीं है कि दुनिया ऐसी किसी महामारी से मुकाबला कर रही है. साल 1918 में स्‍पेनिश फ्लू ने पूरी दुनिया में करीब 10 करोड़ लोगों की जिंदगी छीन ली थी. तब महात्‍मा गांधी ने कुछ नियमों का पालन कर इस महामारी को हरा दिया था.

कोरोना वायरस (Coronavirus) का खौफ इस समय पूरी दुनिया में फैला हुआ है. अभी तक इस जानलेवा वायरस की वजह से 19,603 लोगों की जान जा चुकी है. भारत (India) में 586 लोग संक्रमित हो चुके हैं. इनमें 11 लोगों की मौत हो चुकी है. हालांकि, 40 लोग स्‍वस्‍थ्‍य होकर घर लौट चुके हैं. केंद्र सरकार ने संक्रमण फैलने से रोकने के लिए पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन (Lockdown) कर दिया है. ये पहली बार नहीं है कि दुनिया ऐसी किसी महामारी (Epidemic) का सामना कर रही है. अब से 102 साल पहले 1918 में भी ऐसी ही एक महामारी ने पूरी दुनिया में तबाही मचाई थी. अकेले भारत में ही तब करीब 14 लाख लोग इस बीमारी की चपेट में आए थे. महात्‍मा गांधी (Mahatma Gandhi) भी उस महामारी की चपेट में आ गए थे. तब उन्‍होंने गुजरात के अपने आश्रम रहकर ही उस महामारी को मात दी थी.



महात्‍मा गांधी को 1918 में हो गया था स्‍पेनिश फ्लू

दुनिया पहले विश्वयुद्ध (World War 1) से बाहर निकली ही थी कि 1918 में स्पेनिश फ्लू (Spanish Flu) ने तबाही शुरू कर दी. एक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में स्‍पेनिश फ्लू के कारण करीब 10 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी. महात्मा गांधी के एक सहयोगी ने एक बार बताया था कि 1918 में उन्हें भी स्‍पेनिश फ्लू हो गया था. तब उन्‍हें दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से लौटे हुए चार साल गुजर चुके थे. उस वक्त महात्मा गांधी की उम्र 48 साल थी. फ्लू होने पर उन्हें आराम करने को कहा गया था. इसके बाद वह लिक्विड डाइट (Liquid Diet) पर चले गए. जब उनकी बीमारी की खबर फैली तो एक स्थानीय अखबार ने लिखा था कि गांधीजी की जिंदगी सिर्फ उनकी नहीं है, बल्कि पूरे देश की है.

राष्‍ट्रपिता के नियमों से बच गए सभी आश्रमवासी
महात्‍मा गांधी ने संयम, एकांतवास और लिक्विड डाइट पर भरोसा जताया. जल्‍द ही वह स्‍वस्‍थ हो गए. इस दौरान उनके आश्रम में रहने वाले सभी लोगों ने महात्‍मा गांधी के नियमों का पालन किया. इससे आश्रम में रहने वाले सभी लोग स्‍पेनिश फ्लू से बच गए. महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान प्‍लेग का भी जमकर मुकाबला किया था. उस दौरान उन्‍होंने गौटेंग प्रांत में स्वयंसेवक के तौर पर दक्षिण अफ्रीका में काम किया था. सामुदायिक कार्यकर्ता लिन वान डेर शिफ ने कहा था कि जोहानिसबर्ग में प्लेग के प्रकोप की पहचान करने में गांधी की भूमिका बहुत अहम थी. साथ ही उन्‍होंने मरीजों को स्‍वस्‍थ रखने की सलाह दी थी. अगर उनके सुझाव पर अमल नहीं किया गया होता तो बीमारी का प्रसार बहुत भयानक होता.

निराला की पत्‍नी का फ्लू से हो गया था निधन
गांधी और उनके सहयोगी किस्मत के धनी थे कि वो सब बच गए. हिंदी के मशहूर लेखक और कवि सुर्यकांत त्रिपाठी निराला की बीवी और घर के कई दूसरे सदस्य इस बीमारी की भेंट चढ़ गए थे. उन्‍होंने लिखा था कि पलक झपकते ही मेरा परिवार आंखों से ओझल हो गया. उन्‍होंने तब के हालात के बारे में लिखा कि गंगा नदी शवों से पट गई थी. चारों तरफ इतने शव थे कि उन्हें जलाने के लिए लकड़ी कम पड़ रही थी. खराब मानसून की वजह से सूखा पड़ने के बाद हालात और बिगड़ गए. लोग और कमजोर होने लगे. उनकी प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई. शहरों में भीड़ बढ़ने लगी. इससे बीमार पड़ने वालों की संख्या बढ़ गई.

बॉम्‍बे में 7 पुलिसकर्मी बने थे पहले शिकार
स्‍पेनिश फ्लू के कारण 10 जून, 1918 को बॉम्‍बे के 7 पुलिसकर्मियों को बुखार की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया. अगले कुछ हफ्तों में बीमारी तेजी से फैली. कई कंपनियों के कर्मचारी इसका शिकार बन गए. इनमें शिपिंग फर्म, बॉम्बे पोर्ट ट्रंस्ट के कर्मचारी भी थे. वहीं, हांगकांग और शंघाई बैंक में काम करने वाले भी इस गंभीर बीमारी की चपेट में आए. इस फ्लू की चपेट में आए मरीजों को बुखार, हड्डियों व आंखों में दर्द की शिकायत होती थी. रेलवे लाइन शुरू होने की वजह से देश के दूसरे हिस्सों में भी ये बीमारी तेजी से फैल गई. बाद में असम में इस फ्लू का एक इंजेक्शन तैयार किया गया, जिससे कथित तौर पर हजारों मरीजों का टीकाकरण किया गया. इससे इस बीमारी को रोकने में कुछ कामयाबी मिली.

मारे गए थे करीब 1.75 करोड़ भारतीय : टर्नर
माना जाता है कि यह फ्लू बॉम्बे (अब मुंबई) में लौटे सैनिकों के जहाज से 1918 में पूरे देश में फैला था. हेल्थ इंस्पेक्टर जेएस टर्नर के मुताबिक, इस फ्लू का वायरस चुपके से भारत में घुसा और तेजी से फैल गया. उसी साल सितंबर में यह महामारी दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में फैलनी शुरू हो गई. हालांकि, आधिकारिक रिपोर्ट में 14 लाख भारतीयों के इस बीमारी से मरने की बात कही गई है, लेकिन टर्नर के अनुमान के मुताबिक इसकी वजह से करीब पौने दो करोड़ भारतीयों की मौत हुई थी. ये संख्‍या विश्व युद्ध में मारे गए लोगों से भी ज्यादा थी. उस वक्त भारत ने अपनी आबादी का छह फीसदी हिस्सा इस बीमारी में खो दिया. मरने वालों में ज्यादातर महिलाएं थीं. ऐसा माना जाता है कि इस महामारी से दुनिया की एक तिहाई आबादी प्रभावित हुई थी और करीब पांच से दस करोड़ लोगों की मौत हो गई थी.

जुलाई, 1918 में हर दिन मर रहे थे 230 लोग
बड़ी आबादी के कारण बॉम्बे में संक्रमण फैलने के कारण तेजी से फ्लू का प्रकोप बढ़ता चला गया. देश में जुलाई, 1918 में हर दिन करीब 230 लोग स्‍पेनिश फ्लू से मर रहे थे. द टाइम्स ऑफ इंडिया ने तब लिखा था कि बॉम्बे में करीब हर घर में किसी न किसी को बुखार की शिकायत है. इसका सबसे अच्छा उपचार है कि चिंता न करें और घर में रहकर आराम करें. तब अखबार ने लोगों को सलाह दी कि वे दफ्तरों और फैक्टरियों से दूर अपने-अपने घरों में रहें. इसके अलावा मेला, त्योहार, थिएटर, स्कूल, सिनेमा घर, रेलवे प्लेटफॉर्म जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें. इसके अलावा हवादार घर में सोने, पोषक खाना खाने और कसरत करने की सलाह दी गई.

फ्लू फैलने के कारणों पर अलग थी अफसरों की राय
भारत में स्‍पेनिश फ्लू के फैलने को लेकर ब्रिटिश अधिकारियों की राय अलग थी. हेल्थ इंस्पेक्टर टर्नर मानते थे कि बॉम्बे के बंदरगाह पर बाहर से आए जहाज ने यह बीमारी भारत में फैलाई थी. वहीं, सरकार का मानना था कि यह फ्लू शहर में बाहर से नहीं आया था बल्कि यहीं फैला था. लॉरा स्पिनी ने पेल राइडर- द स्पेनिश फ्लू ऑफ 1918 नाम की किताब में लिखा है कि अस्पताल के सफाईकर्मियों को इलाज करा रहे ब्रिटिश सैनिकों से दूर रखा गया था. ब्रिटिश अधिकारियों को स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य की अनदेखी करने की कीमत चुकानी पड़ी थी. डॉक्टरों की भारी कमी ने हालात और खराब कर दिए थे. एक बार फिर 1919 की शुरुआत में स्पेनिश फ्लू ने बर्बादी फैलाई.

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