अच्‍छी खबर: कोरोना वायरस में नहीं हो रहा म्‍यूटेशन, दवा या वैक्‍सीन बनने पर लंबे समय तक होगी कारगर

वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कोरोना वायरस (Coronavirus) एंफ्लुएंजा की तरह तेजी से अपना जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर नहीं बदल पा रहा है. ऐसे में अगर इस वायरस की कोई वैक्सीन (Vaccine) या दवा (Medicine) बना ली जाती है तो वह लंबे समय तक कारगर रहेगी. ये जानकारी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए राहत देने वाली है.

कोरोना वायरस (Coronavirus) चीन से निकलने के बाद दुनिया भर के देशों को अपनी चपेट में लेकर अब तक 529,613 लोगों को संक्रमित कर चुका है. इनमें 23,976 लोगों की गंभीर संक्रमण के कारण मौत हो चुकी है. वहीं, 1,23,380 लोग संक्रमण से उबरकर अपने घरों को लौट चुके हैं. दुनिया भर की सरकारें संक्रमण (Infection) के फैलने की रफ्तार को थामने के लिए लॉकडाउन (Lockdown) समेत तमाम उपाय अपना रही हैं. इस बीच दुनिया भर में वैज्ञानिक इसका इलाज (Treatment) खोजने में जुटे हैं. हालांकि, उन्‍हें अभी कोरोना वायरस की कोई दवाई या वैक्‍सीन (Vaccine) में सफलता नहीं मिल पाई है. अमेरिका, चीन, जापान समेत सभी देश मलेरिया के इलाज में इस्‍तेमाल होने वाली हाइड्रॉक्‍सीक्‍लोरोक्विन से मरीजों का उपचार कर रहे हैं.



एंफ्लुएंजा की तरह जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर नहीं बदल रहा COVID-19

वैज्ञानिकों ने इस बीच पता लगा लिया है कि कोरोना वायरस एंफ्लुएंजा की तरह तेजी से अपना जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर नहीं बदल पा रहा है. ये जानकारी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए काफी राहत देने वाली है. भारत (India) में जब वैज्ञानिकों ने इसके स्‍ट्रेन (Strain) को अलग किया था तो बताया था कि उसकी संरचना लगभग वुहान (Wuhan) में पाए गए वायरस जैसी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस के जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर को नहीं बदल पाने के कारण लंबे समय तक काम करने वाली वैक्सीन बनाना आसान हो जाएगा. दरअसल, एंफ्लुएंजा जैसे कई वायरस लगातार अपनी जेनेटिक संरचना बदलते रहते हैं. इस वजह से उनके लिए हर बार नई जेनेटिक संरचना के मुताबिक नई वैक्सीन बनानी पड़ती है.

एक व्‍यक्ति से दूसरे में जाने पर जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर बदलते हैं वायरस
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के वैज्ञानिकों के कोरोना वायरस स्‍ट्रेन को अलग करने में सफल होने पर बताया था कि ये कई देशों में रहने वाले लोगों के जरिये भारत तक पहुंचा है. सामान्य तौर पर कोई वायरस एक से दूसरे मानव शरीर में पहुंचने के बाद अपनी जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर बदलता रहता है. वायरस के जेनेटिक संरचना बदलने की प्रक्रिया को म्यूटेशन कहा जाता है. आईसीएमआर के मुताबिक, कोरोना वायरस में म्यूटेशन की प्रक्रिया नहीं हो रही है. आईसीएमआर के वैज्ञानिक रमन गंगाखेड़कर ने बताया था कि भारत में मिले कोरोना वायरस की जेनेटिक संरचना 99.9 फ़ीसदी वुहान शहर में मिले वायरस जैसी ही थी.

लंबे समय तक एक ही वैक्‍सीन से हो सकेगा मरीजों का इलाज
भारत में नहीं कोरोना वायरस का जेनेटिक स्‍ट्रक्‍चर पूरी दुनिया में काफी तक वुहान में पाए गए वायरस के जैसा ही पाया गया है. ऐसे में माना जा रहा है कि अगर इस वायरस को रोकने के लिए कोई वैक्सीन या कारगर दवा बना ली जाती है तो वह लंबे समय तक कारगर रहेगी. हालां‍कि, आइसीएमआर के वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि इस वायरस के बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. लंबे समय तक वायरस पर नजर रखने और शोध करते रहने से ही कुछ साफ हो पाएगा. फिलहाल तो ये भी नहीं बताया जा सकता है कि वैक्‍सीन कब तक बनेगी. दरअसल, वैज्ञानिकों का कहना है कि कई बार कुछ बीमारियों की वैक्‍सीन दी जाने के बाद भी व्‍यक्ति उस वायरस से संक्रमित हो जाता है. ऐसे में उसे बेस्‍टर डोज देने की जरूरत होती है. हो सकता है कि इस वायरस के इलाज के लिए बनाई जाने वाली दवा या वैक्‍सीन की बूस्‍टर डोज देने की जरूरत भी न हो.

फिलहाल मलेरिया में दी जाने वाली दवा से हो रहा है इलाज
वायरस के बारे में काफी जानकारी इकट्ठा होने के बाद भी सवाल उठता है कि अब तक इसका कोई कारगर इलाज तैयार क्‍यों हो पा रहा है. इस पर स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस कोरोना समूह का ही नया वायरस है. इसलिए इसके इलाज के लिए दवा और वैक्‍सीन पुरानी तर्ज पर ही बनानी होगी. महामारी से निपटने में बुरी तरह नाकाम अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने कोरोना के इलाज के लिए हाइड्रॉक्‍सीक्‍लोरोक्विन नाम की दवा के इस्‍तेमाल को मंजूरी दे दी है. यह दवा मलेरिया और फेफड़ों (Lungs) में संक्रमण के इलाज के लिए पहले से ही इस्‍तेमाल की जाती रही है. हालांकि, कहा जा रहा है कि पूरी रिसर्च के निकलकर नहीं आने के कारण इस दवा को पूरी तौर पर सही इलाज मानना ठीक नहीं होगा.

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