जंग जीतनी है / भोपाल में 169 कोरोना वाॅरियर्स महिलाओं ने 8 दिन में 50 हजार मास्क बनाए, पुलिस-प्रशासन और सेना को सप्लाई किए

कोरोना वाॅरियर्स महिलाओं ने 8 दिन में बना डाले 50 हजार मास्क।

राज्य आजीविका मिशन से जुड़ी हैं ये महिलाएं, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए बना रही हैं मास्क22 गांव कीये महिलाएं हर रोज कामकाज निपटाने के बाद जुट जाती हैं, एक मास्क की लागत 6 रुपए

भोपाल. भोपाल के आसपास के 22 गांवों में रहने वाली 169 कोरोना वाॅरियर्स महिलाएं घर के कामकाज निपटाकर ज्यादा से ज्यादा मास्क बना रही हैं। 8 दिन में अब तक 50 हजारमास्क बना चुकी हैं। लक्ष्य तय नहीं है, लेकिन मकसद एक ही है कोरोना को हराना।हमीदिया अस्पताल, जेके हॉस्पिटल कोलार, पुलिस हेडक्वार्टर, नगर निगम, आदिवासी विभाग, प्रशासन, सुल्तानिया अस्पताल, सतपुड़ा भवन, ग्राम पंचायत के साथ-साथ सेना को भी मास्क भेजे जा रहे हैं।अब भोपाल के अलावा दूसरे जिलों को भी जरूरत हो तो ये सभी तैयार हैं।

एक मास्क की लागत 4 रुपए 50 पैसे आती है, इसमें कपड़ा, सिलाई, और मेहनताना शामिल है। वितरित करने तक का खर्च मिला दें तो लागत करीब 6 रुपए हो जाती है। इसकी सप्लाई के प्रति मास्क 10 रुपए होती है। ये मास्क रि-यूजेबल हैं। इन महिलाओं को ये जिम्मेदारी जिला प्रशासन ने दी है। राज्य आजीविका मिशन से जुड़ी ये महिलाएं पहले सिलाई-कड़ाई का काम करती थीं।

सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी हो रहा है
मेंडोरी की बीना तोमर इस कोशिश में रहती हैं कि इतना अधिक वक्त मिल जाए कि ज्यादा से ज्यादा मास्क बन जाएं। वह यह जानती है कि वायरस की रोकथाम में ये मास्क कुछ कारगर तो साबित हो सकते हैं। ईंटखेड़ी में चारों महिलाएं राधा, शिखा, राजकुमारी और अंगूरी सोशल डिस्टेंसिंग का पॉलन करते हुए काम कर रही हैं। ईंटखेड़ी की पिंकी जाट भी कहती हैं कि इस काम में उनके पूरे परिवार का सहयोग मिल रहा है। यही वजह है कि वे दिनभर मास्क बना पाती हैं। आजीविका मिशन का जिम्मा भी तय है कि जैसे ही मास्क तैयार होते हैं, उन्हें वितरित करने से पहले गुनगा में स्टेरेलाइज किया जाता है। ताकि वे बचाव में कारगर साबित हों।

मास्क बनाने की बात पर पति ने प्रोत्साहित किया
जानकारी के अनुसार मेंडोरी में 10, रतुआ रतनपुर में 30, नजीराबाद में 12, रातीबड़ में 14, ईंटखेड़ी में 18, रायपुर में 9, कलखेड़ा में 6, इस्लाम नगर में 4, करोंदिया में 8, गिल्लोर में 4 और रुनाहा में 6 महिलाएं प्रमुख रूप से काम कर रही हैं। बाकी गांवों में एक-दो महिलाओं की टीम है। इन महिलाओं का समन्वय कर रहीं राज्य आजीविका मिशन की परियोजना प्रबंधक रेखा पांडेयका कहना है कि पति निजी क्षेत्र में काम करते हैं। बच्चे और पति मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। लेकिन जब मॉस्क बनाने की बात कहकर जाती हूं तो प्रोत्साहित करते हैं।


लॉक डाउन के साथ ही खड़ी हो गईं महिलाएं
राज्य आजीविका मिशन से जुड़ी ये कोरोना वारियर्स महिलाएं पहले सिर्फ घर में सिलाई-कढ़ाई रहीं थीं। जैसे ही प्रधानमंत्री ने एक दिन का लॉक डाउन किया, उसी दिन ये महिलाएं खड़ी हो गईं। मिशन की जिला परियोजना प्रबंधक रेखा पांडे इन महिलाओं का समन्वय कर रही हैं। रेखा पांडे का कहना है कि 19 मार्च को भोपाल हाट में मेला भरा। इसमें सेंपल के तौर पर मास्क रखे गए थे। जैसे ही लॉक डाउन हुआ, भोपाल कलेक्टर तरुण पिथोड़े और जिला पंचायत सीईओ सतीश कुमार एस ने यह मास्क देखा। दो सेंपल जांच के लिए भेजे गए। नॉन वोवन फैब्रिक से यह बनता है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर मेडिकल के क्षेत्र में होता है। दो तीन लेयर मिलाकर मास्क तैयार कर रहे हैं। यह जीवाणू या पेस्टीसाइड के विरुद्ध कारगर रहता है। जिले की मेडिकल टीम ने इसे पास किया है। इसी के बाद बड़े पैमाने पर बना रहे हैं। अभी तक कई जगह वितरित किया जा चुका है।

छह रुपए में तैयार होता है
परियोजना प्रबंधक रेखा पांडेयने बताया कि एक मास्क की लागत 4 रुपए 50 पैसे आती है। इसमें कपड़ा, सिलाई और मेहनताना शामिल है। वितरित करने तक का खर्च मिला दें तो लागत करीब 6 रुपए हो जाती है।

राज्य आजीविका मिशन से जुड़ी ये महिलाएंं पहले केवल सिलाई-कढ़ाई करती थीं।

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