कोरोना वायरस: लॉकडाउन में बढ़ीं थैलेसीमिया मरीजों की मुश्किलें, नहीं मिल पा रहा खून

COVID-19 का कहर रोकने के लिए देशव्यापी तालाबंदी (lockdown) ने उन हजारों थैलेसीमिया मरीजों (thalassaemia patients) के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है, जिन्हें जिंदा रहने के लिए नियमित तौर पर खून चढ़ाए जाने की जरूरत होती है.

कोरोना वायरस के संक्रमण (coronavirus infection) से बचने के लिए देश में 21 दिनों का लॉकडाउन (lockdown) चल रहा है. इसका असर थैलेसीमिया के मरीजों पर भी पड़ रहा है. वे इलाज या थैरेपी के लिए आसानी से बाहर नहीं निकल पा रहे और न ही उन्हें ब्लड डोनर (blood donar) मिल पा रहे हैं.

इस बारे में गोरखपुर यूनिवर्सिटी की 24 वर्षीय स्टूडेंट स्निग्धा चैटर्जी कहती हैं- मुझे हर दो सप्ताह में दो यूनिट खून चाहिए होता है. मैं संजय गांधी पीजीआई लखनऊ में इलाज लेती हूं. अब लॉकडाउन के चलते जाना मुमकिन नहीं और खून देने वाले भी नहीं के बराबर मिल रहे हैं.

खून चढ़ाए जाने के अलावा स्निग्धा जैसे थैलेसीमिया के मरीजों को शरीर में जमा अतिरिक्त लोहे को निकालने के लगातार एक खास थैरेपी से गुरजना होता है जिसे iron chelation कहते हैं. बता दें कि थैलेसीमिया खून की एक जेनेटिक बीमारी है जिसमें शरीर में हीमोग्लोबिन असामान्य तरीके से बनता है. इसकी वजह से लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से मरती जाती हैं और मरीज गंभीर रूप से एनीमिया का शिकार हो जाता है. यानी उसके शरीर में स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाती है.

11 बरस के खुर्शीद खान थैलेसीमिया के एक और मरीज हैं जो बस्ती, उत्तरप्रदेश के एक गांव में रहते हैं. वे भी लॉकडाउन की वजह से अस्पताल नहीं जा पा रहे और फिलहाल तकलीफ में हैं. खुर्शीद की मां शहनाज न्यूज18 से बातचीत में कहती हैं- लखनऊ हमारे गांव से लगभग 200 किलोमीटर दूर है. अब इन हालातों में मैं कैसे अपने बेटे को लेकर जाऊं? मुझे नहीं लगता है कि वो जियेगा अगर लॉकडाउन चलता रहे.

यहां ये जानना जरूरी है कि भारत में पूरी दुनिया में थैलेसीमिया के मरीज सबसे ज्यादा हैं. यहां तक कि इसे थैलेसीमिया कैपिटल कहा जाता है. हर साल 10 हजार से ज्यादा शिशु इस बीमारी के गंभीर रूप के साथ जन्म लेते हैं, जिसे थैलेसीमिया मेजर कहा जाता है. बीमारी माता-पिता से बच्चों में जाती है. अगर इनमें से कोई एक थैलेसीमिया का वाहक हो, तो बच्चा थैलेसीमिया माइनर हो सकता है यानी उसके लक्षण दिखाई नहीं देंगे और वो मरीज होने के बावजूद सामान्य जिंदगी बिता सकता है. लेकिन अगर माता-पिता दोनों ही बीमारी से ग्रस्त हों तो बहुत मुमकिन है कि बच्चे में बीमारी की गंभीरता बढ़ जाए.

आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश में थैलेसीमिया के 3.5 करोड़ से अधिक वाहक हैं. ऐसा अनुमान है कि हर महीने लगभग 1 लाख मरीज ब्लड ट्रांसफ्यूजन से गुजरते हैं और केवल इन्हीं के इलाज के लिए 2 लाख यूनिट से भी ज्यादा खून की जरूरत होती है. इन हालातों में सुधार के लिए सरकारी सुविधाएं बहुत कम हैं. यही वजह है कि इलाज पर 90% से ज्यादा खर्च मरीज ही करते हैं और हर मरीज अनुमानतः हर साल 1 लाख रुपए इलाज पर खर्च करता है.

इस बारे में आर्थिक तंगी से जूझ रही खुर्शीद की मां बताती हैं- हमारे पास रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने को पैसे पूरे नहीं पड़ते. मैं खुर्शीद को मुंबई ले जाना चाहती थी क्योंकि एक रिश्तेदार ने वहां पर एक सस्ता इलाज दिलवाने का वादा किया था. लेकिन अब ट्रेनें भी बंद पड़ी हैं और मैं यहां फंस गई हूं.

इधर लखनऊ के संजय गांधी पीजीआई में न केवल यूपी, बल्कि पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आते हैं. स्निग्धा कहती हैं- मैं SGPGI में नियमित तौर पर आती हूं. उत्तरप्रदेश के अलावा यहां बिहार और झारखंड से भी लोग आते हैं. इनमें से कई मरीज बहुत गरीब होते हैं और यहां तक कि आने-जाने का खर्च भी नहीं उठा पाते हैं.

अब कोरोना संक्रमण रोकने के लिए हुए 3 हफ्तों के लॉकडाउन का वक्त थैलेसीमिया के मरीजों के लिए काफी मुश्किल वक्त हो गया है. उन्हें खून चढ़ाने के लिए रक्तदाता नहीं मिल रहे. ब्लड डोनेशन कैंप भी नहीं हो रहे और न ही ब्लड बैंकों में खून मिल पा रहा है.

पिछले सप्ताह इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी (IRCS) ने एक ट्वीट किया था- COVID2019 को फैलने से रोकने के लिए एक जगह पर बहुत से लोगों के इकट्ठा होने पर मनाही है. इस बात के मद्देनजर IRCS NHQ ने अपने सभी निर्धारित ब्लड डोनेशन कार्यक्रम फिलहाल के लिए स्थगित कर दिए. इसकी वजह से यहां के ब्लड बैंकों में भी खून की बहुत ज्यादा कमी हो गई है. एक दूसरे ट्वीट में IRCS ने लिखा- थैलेसीमिक बच्चे, जो हमारे ब्लड बैंक से नियमित तौर पर खून लेते हैं, वे सबसे बुरी तरह से प्रभावित हैं. हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आगे आएं और हमारे साथ मिलकर इस मुश्किल वक्त में उन्हें जिंदगी का तोहफा दें. आज सुबह 10 से शाम 6 बजे तक IRCS NHQ में रक्तदान करें. COVID2019.
मरीजों के रिश्तेदारों ने सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू किया है ताकि मदद की जा सके और जागरुकता फैलाई जा सके.

स्निग्धा के चाचा उम्मीद जताते हैं- हम सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से इस मुद्दे को उठाने और लोगों में जागरुकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे मदद के लिए सामने आएं और मानवीय मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाएं घर-घर जाकर रक्तदाताओं से खून लें. स्वेच्छिक तौर पर काम करने वाले रक्तदाता है. मुझे यकीन है कि वे आगे आएंगे. रेजिडेंट्स वेलफेयर सोसायटीज भी खून संग्रहित करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.

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