भोपाल / दुकानदार ने दाम बढ़ाए तो गांव का एक व्यक्ति 30 किमी दूर से ला रहा सभी का सामान

अपने घर पहुंचने के लिए मजदूरों को जो साधन मिल रहा है उससे पहुंच रहे हैं।
गांवों में भी पूरी तरह लॉकडाउन है। छोटी दुकानें बंद हैं। संपर्क भी पूरी तरह कटा हुआ है।
गांवों में होम डिलीवरी जैसी सुविधा भी नहीं है, ऐसे में ग्रामीणों को राशन के लिए बाहर जाना पड़ रहा है


गांवों में भी पूरी तरह लॉकडाउन है। छोटी दुकानें बंद हैं। संपर्क भी पूरी तरह कटा हुआ है। गांवों में होम डिलीवरी जैसी सुविधा भी नहीं है, ऐसे में ग्रामीणों को राशन के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। कई जगह पुलिस उन्हें बाहर भी नहीं जाने दे रही। प्रशासन शहरी क्षेत्र में स्थिति नियंत्रित करने में जुटा है, ऐसे में गांव के लोग अपने स्तर पर ही हालात का सामना कर रहे हैं।

सिरोंज (विदिशा)- अगरिया समुदाय के 20 परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट, आटा मांगकर भर रहे हैं पेट

सिरोंज से 25 किमी दूर दीपनाखेड़ा में रहने वाले अगरिया समुदाय के लोगों के 20 परिवारों के 80 लोगों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई है। गांव के बाहर ये लोग टपरिया बनाकर रहते हैं। लोहे का सामान बेचकर और बहरूपिया बनकर रोजी-रोटी कमाना इस समुदाय की मुख्य पहचान है। लॉकडाउन के बाद हाल यह है कि परिवार की भूख खत्म करने के लिए इन्हें गांव में ही आटा मांगना पड़ रहा है। अगरिया समुदाय के महाराज सिंह बताते हैं कि हमारे परिवार की महिलाएं भी हथौड़ा चलाकर लोहे की सामग्री तैयार करती हैं। रोज कमाते और अच्छा खाते हैं। लेकिन अब लोग अपने घरों से ही नहीं निकल रहे हैं तो कोई काम भी नहीं मिल रहा है। समुदाय के युवक जयराम, राधेश्याम और विजयसिंह ने बताया कि अब बहरूपिया भी बनेंगे तो किसको दिखाएंगे। कभी सोचा नहीं था कि परिवार का पेट भरने के लिए आटा भी मांगना पड़ेगा।

बरेली (रायसेन)- गांव में नहीं है कोई भी दुकान, खराब रास्ते से 10 किमी दूर आकर खरीदना पड़ रहा है सामान

तहसील से 23 किमी दूर स्थित ढूडादेह गांव में एक हजार लोगों की आबादी है। यह गांव इतना ज्यादा पिछड़ा है कि गांव तक पहुंचने के लिए रास्ता तक नहीं है। इस गांव में न तो कोई किराने की दुकान है और न ही चिकित्सा की कोई सुविधा। ऐसी स्थिति में गांव के लोगों को 10 किमी दूर चैनपुर पहुंचकर सामान खरीद कर लाना पड़ रहा है। यहां तक आने के लिए ग्रामीणों को पैदल या फिर अपने साधन से आना पड़ता है। इस कारण उन्हें पैदल ही गांव से चैनपुर तक आना मजबूरी बन गया है। ढूडादेह गांव में रहने वाले महिपाल आदविासी, रमेश कुमार, वीरेंद्र सिंह और प्रकाश ने बताया कि उनके गांव में अब तक कोई भी अधिकारी नहीं आया है। गांव में रहने वाले लोगों के पास उनकी जरूरत का सामान खत्म होता जा रहा है। जिनका सामान खत्म हो जाता है, उन्हें 10 किमी दूर चैनपुर गांव पहुंच कर सामान लाना पड़ रहा है।

बमोरी (गुना)- प्याज की चटनी बनाकर खा रहे रोटी, बेटी मजदूरी करने गई राजस्थान इसलिए 75 साल की मीरा 2 दिन से भूखी

बमोरी के भील बाहुल्य गांव महुआखेड़ा में 63 परिवार रहते हैं। आमतौर पर यहां के लोग किराने का सामान गांव से 3 किमी दूर दुकान से लेते रहे हैं। कोरोना के चलते दुकानदार ने कीमतें बढ़ा दीं है इसलिए यहां के लोग 30 किमी दूर फतेहगढ़ जाकर सामान ला रहे हैं। गांव के भीमसिंह ने बताया कि एक-दो दिन में गांव का कोई एक शख्स फतेहगढ़ जाकर तीन-चार घरों का सामान ले आता है। 6-7 दिन से गांव के लोगों सब्जी तो देखी ही नहीं है। कुछ लोगों ने खेत में प्याज बोई है तो उसी से काम चला लेते हैं। नहीं चटनी और कुछ घरों में दाल से रोटी खाई जा रही है। वहीं पास के ग्वारखेड़ा गांव की सहरिया बस्ती के टपरे में रह रही 75 साल की मीरा सहरिया ने बताया कि उसने दो दिन से खाना नहीं खाया। उसकी बेटी मजदूरी के लिए राजस्थान गई है और अब तक वापस नहीं लौटी। अब तक गांव के लोग मीरा बाई को खाना दे देते थे। अब वे भी संकट में हंै। सरपंच बोले- कोई फंड भी नहीं है, जिससे कि हम खाना दे सकें।

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