कोरोना का दर्द / दिल्ली में 5 दिन भटकता रहा, भोपाल में इलाज मिला, तब तक कुछ नहीं बचा

Wandered for 5 days in Delhi, got treatment in Bhopal, till then nothing left

दिल्ली में अस्पतालों की लापरवाही के कारण परिवार संकट में आया, बेटा-भाई भोपाल में क्वारेंटाइन, पत्नी दिल्ली में भर्ती, बेटी आइसोलेट

भोपाल. कोरोना काल में अस्पतालों की लापरवाही कैसे बेरहम हालात पैदा कर सकती है, इसे समझने के लिए वीरेंद्र नेकिया और उनके परिवार काे मिला दर्द महसूस करना होगा। दिल्ली के मयूर विहार निवासी वीरेंद्र की मौत कोरोना से रविवार सुबह 4 बजे हमीदिया अस्पताल में हुई। वे दिल्ली के अस्पतालों में इलाज के लिए पांच दिन भटकने के बाद शनिवार सुबह निजामुद्दीन-हबीबगंज एक्सप्रेस से भोपाल आए थे। यहां जब तक उन्हें इलाज मिला, तब तक कुछ बाकी नहीं बचा था। वीरेंद्र के साथ एस-10 कोच में आए यात्रियों को ढूंढा जा रहा है। अस्पतालों की असंवेदनशीलता के कारण वीरेंद्र का चार लोगों का परिवार चार हिस्सों में बंट गया। उस परिवार पर क्या-क्या गुजरी, इन चार दृश्यों से समझें…

दिल्ली टू भोपाल : चार लाेगों का परिवार, चार हिस्से में बंटा

आठ दिन पहले बुखार आया, पर दिल्ली में किसी ने टेस्ट नहीं किया

वीरेंद्र मूलत: भोपाल के हैं। यहां पढ़ रहे बेटे आदित्य ने बताया कि आठ दिन पहले दिल्ली में पापा को बुखार आया। संजीवनी क्लीनिक, हेल्थ सेंटर से दवाइयां लीं, पर आराम नहीं मिला। पांच दिन अस्पतालों में भटके, लेकिन किसी ने कोरोना टेस्ट नहीं कराया। जेपी में लैब टेक्नीशियन चाचा नरेंद्र से बात कर पापा को भोपाल बुला लिया।

जेपी पहुंचे तब 35% था ऑक्सीजन सेचुरेशन, ये 60% होना चाहिए था

जेपी के स्टाफ ने सैंपल लेकर वीरेंद्र को हमीदिया भेज दिया। हमीदिया के डाॅक्टराें के अनुसार, वीरेंद्र जब जेपी पहुंचे, तब उनके शरीर में ऑक्सीजन सेचुरेशन 35% था, जाे 95% हाेना चाहिए। हमीदिया में वेंटिलेटर सपाेर्ट के बाद भी 60% तक नहीं पहुंचा। दाेपहर 3:30 बजे कोरोना टेस्ट रिपोर्ट पाॅजिटिव आई। उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया।

बेसुध मां को लेकर दिल्ली के अस्पतालों में भटकती रही बेटी

आदित्य ने बताया- पापा की मौत की खबर सुनकर दिल्ली में मां को अस्थमा अटैक आया। 15 साल की बहन उन्हें लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल ले गई, लेकिन किसी ने हाथ नहीं लगाया। बेसुध मां डेढ़ घंटे ऑटो में पड़ी रही। फिर नोएडा के प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाना पड़ा, पर वहां 60 हजार रु. जमा करने काे कहा। मेडिकल कार्ड देने के बाद भी 20 हजार जमा कराए। अब मां हाॅस्पिटल में है, बहन घर में क्वारेंटाइन।

सुबह से जहां गए ही नहीं, उस इलाके को बना दिया कंटेनमेंट
नरेंद्र ने बताया कि सुबह वीरेंद्र को स्टेशन से पहले जेपी, फिर हमीदिया ले गया। तब तक डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा। जब हमीदिया में उसकी हालत बिगड़ी तो खुद को संभाल नहीं पाया। दाेपहर चार बजे भदभदा विश्रामघाट पर आदित्य के साथ मिलकर पूरे प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अंतिम संस्कार किया। वहां से सीधे क्वारेंटाइन सेंटर आ गया। फिर भी मोहल्ले को कंटेनमेंट क्षेत्र बना दिया। शेष | पेज 4 पर


दिल्ली से जब वीरेंद्र आए, तो हालत गंभीर थी
– डाॅ. एके श्रीवास्तव, अधीक्षक, हमीदिया अस्पताल का कहना है कि दिल्ली से आए पेशेंट की हालत बेहद गंभीर थी। ऑक्सीजन सेचुरेशन 35 प्रतिशत था, वेंटिलेटर पर लेने के बाद भी 60 प्रतिशत नहीं पहुंच रहा था। हमारे डाॅक्टराें ने हर तरीके से हर संभव प्रयास किए, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।

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