ध्यान/साधना के सोपान/सीढ़ी चढ़ने के लिए जीवन के तीन सूत्र समझने लायक हैं।।

ध्यान/साधना के सोपान/सीढ़ी चढ़ने के लिए जीवन के तीन सूत्र समझने लायक हैं। पहला सूत्र है – वर्तमान में जीना (लिविंग इन द प्रेजेंट)। अतीत और भविष्य के चिंतन की यांत्रिक धारा में बहने के कारण, वर्तमान के जीवित/मौलिक क्षण व्यर्थ ही निकल जाते हैं। न अतीत की कोई सत्ता है, न भविष्य की; यह एक स्मृति/मृत यात्रा-मात्र ही होते हैं। वास्तविक और जीवित क्षण केवल वर्तमान है। सत्य केवल वर्तमान में रहकर ही जाना जा सकता है। जीवन का दूसरा सूत्र है- सहजता से जीना। हमारा सारा व्यवहार, दूसरों को देखते हुये, कृत्रिम और औपचारिक ही होता चला जा रहा है। हमेशा मिथ्या आवरण जैसे पद/रूप/रंग/जाति/भाषा/प्रांत/अमीरी/गरीबी को सदा ओढ़े रहते हैं और इसी आवरण के कारण हमें अपनी वास्तविकता धीरे- धीरे विस्मृत ही हो जाती है। ऐसे मुखौटों को उतार कर, अपनी मौलिकता/सहजता/सरलता को प्रकट होने दें, तभी हम विकसित होने लगते हैं। तीसरा सूत्र है- कुछ क्षण अकेले/अपने साथ होना। ध्यान हमारे अत्यंत अकेलेपन/एकाकीपन/मौन में ही जन्मता है। हम साधारणतः सदा दूसरों से घिरे रहना चाहते हैं। अकेले होने पर हम भय अनुभव करते हैैं। हम भूल जाते हैं कि हम अकेले पैदा हुये और अकेले ही मरना है; यह जीवन-यात्रा हमारी अत्यंत निजी है। इसका मतलब यह नहीं है कि दुनियां/समाज/लोगों से भागना/पलायन करना है। अकेले होने का केवल इतना ही अर्थ है कि बाहर की भीड़ को तो स्वीकारना है, परन्तु भीतर की भीड़ को विसर्जित कर सकें।

हम विभिन्न संबंधों/विचारों/मुखौटों से इतने घिरे हुए हैं कि अपनी निजता को कभी जान ही नहीं पाते हैं। हम अपने संबंधों के अतिरिक्त भी “कुछ” हैं, यह जानना ही जीवन/ध्यान/साधना की यात्रा है।

विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें– गोविन्द दुबे जिला ब्यूरो
दीपक सराठे
संवाददाता DG News निष्पक्ष खबर
9756073239

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