डरा रहे हैं आर्थिक गिरावट के आंकड़े


-ललित गर्ग-
कोरोना महामारी के कारण न केवल भारत बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गयी है।   भारत में लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था की स्थिति न केवल बिगड़ी है, बल्कि रसातल में चली गयी है। हालही में जारी मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों ने किसी खुशफहमी के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी है। सबको पता था कि आंकड़े गिरावट वाले होंगे लेकिन गिरावट 23.9 फीसदी की हो जाएगी, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा। निश्चित रूप से सरकारी आंकडे एवं विश्व की प्रमुख रेटिंग एजेंसियों के आंकड़े गंभीर हैं, चिन्ताजनक है एवं डराने वाले हैं। लेकिन जीडीपी में गिरावट का गवाह बनने वाली हमारी कोई इकलौती अर्थव्यवस्था नहीं हैं। कहीं कम और कहीं ज्यादा, लेकिन लगभग सारी दुनिया के देश विकास दर में अच्छी-खासी गिरावट का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में खराब आंकड़ों के पीछे सीधे तौर पर यह वजह काम कर रही है कि इस तिमाही के दौरान 68 दिन से भी ज्यादा समय तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू रहा, जिसमें तमाम आर्थिक गतिविधियां करीब-करीब ठप हो गई थीं। अकेला कृषि क्षेत्र इससे मुक्त रहा। नतीजा यह कि जहां तमाम सेक्टर गिरावट दिखा रहे हैं वहीं कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
चाहे देशी-विदेशी रेटिंग हों या फिर सरकार के हाल के आंकड़े, लब्बोलुआब सबका यही है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना अब आसान नहीं है। आने वाली तिमाहियों में हालात सुधरेंगे, इसके आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। रेटिंग एजेंसियों के आकलन के जो पैमाने होते हैं, उनमें जीडीपी का आंकड़ा काफी महत्व रखता है। इसके अलावा शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की भूमिका बड़ा कारक होता है। हालांकि इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देश भयानक मंदी का सामना कर रहे हैं। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था तो पिछले दो साल से मुश्किलों से जूझ रही है। ऐसे में वैश्विक रेटिंग एजेंसियों को भारतीय अर्थव्यवस्था में जल्दी सुधार की उम्मीदें लग नहीं रही। भारत में जीडीपी में अभी जो चैबीस फीसद की गिरावट आई है वह संगठित क्षेत्र के आंकड़े आने के बाद और ज्यादा हो सकती है। असंगठित क्षेत्र ही भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज मंदी की मार सबसे ज्यादा यही क्षेत्र झेल रहा है। छोटे व्यापारियों का व्यापार ठप्प होने, नौकरी चले जाने, कमाई बंद होने के कारण आम व्यक्ति का आर्थिक संतुलन बिगड़ गया है, रोजमर्रा के खर्च के लिए प्रॉविडेंट फंड और बचत योजनाओं से पैसा निकालने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सोने का भाव रेकॉर्ड तोड़ ऊंचाइयों पर चले जाना वित्तीय असुरक्षा एवं आर्थिक असंतुलन को दर्शाता है। इन आर्थिक असंतुलन एवं असुरक्षा की स्थितियों से उबारने केे लिये नरेन्द्र मोदी सरकार व्यापक प्रयत्न कर रही है, नयी-नयी घोषणाएं एवं आर्थिक नीतियां लागू कर रही है, जिनसे अंधेरों के बीच उजालों की संभावनाएं दिखना भी जटिल होता जा रहा है।
आने वाले वक्त में आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में सुधार को लेकर रेटिंग एजेंसियों में भले असहमति हो, लेकिन इस बात को लेकर सभी एकमत हैं कि हालात से निपटने के लिए सरकार के पास कोई जादूई चिराग नहीं हैं। भारत में जब पूर्णबंदी लागू की गई थी, तब अनुमान यह था कि जीडीपी में गिरावट अठारह से बीस फीसद रहेगी। लेकिन चैबीस फीसद गिरावट का मतलब यह है कि इन तीन चार महीनों में सब कुछ ठप हो गया। इससे कंपनियों की आय में भारी गिरावट आई और करोड़ों लोगों का रोजगार चला गया। यही वह सबसे जटिल एवं भयावह स्थिति है, जिसके समाधान के लिए सरकार को अपने फैसलों का अपेक्षित असर देखने को मिल नहीं रहा। लेकिन रेटिंग एजेंसियों को उम्मीद की जो किरण दिख रही है, उसके लिए अभी लम्बा इंतजार करना पड़ेगा।
सवाल है कि अकेले कृषि क्षेत्र की बढ़ोतरी अर्थव्यवस्था को कितना सहारा दे पाएगी। इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह है कि इस भीषण गिरावट से उबरने की क्या सूरत हो सकती है। इन दोनों सवालों का जवाब खोजने के सूत्र हमें रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास के उन पांच कारकों में दिखाई देते हैं, जो आने वाले समय में आर्थिक उजाला बन सकते हैं। जिनमेें है कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर, वैकल्पिक ऊर्जा, इन्फॉर्मेशन एंड कम्यूनिकेशन टेक्नॉलजी।  स्टार्टअप्स को उन्होंने ऐसे स्पॉट्स के रूप में चिह्नित किया जो मौजूदा आर्थिक चुनौतियों एवं खतरों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने की सामथ्र्य रखते हैं। जिनसे हमारी आर्थिक रफ्तार एवं आकांक्षा की उड़ान को तीव्र गति दी जा सकेगी। उनके द्वारा कहीं गयी बातों की उपयोगिता और उनके द्वारा चिह्नित क्षेत्रों में मौजूद संभावनाओं को भला कौन खारिज कर सकता है, लेकिन असल बात बड़ी चुनौतियों से निपटने एवं कृषि एवं ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को पहचानने की है, जिसके बगैर बड़ी से बड़ी संभावना भी अभी के माहौल में खुद को साकार नहीं कर पाएगी।
अर्थ का कोमल बिरवा कोरोना के अनियंत्रित प्रकोप के साए में कुम्हला न जाये, इसके लिये इन संभावनाओं को तलाशते हुए कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था को भी बल देने की जरूरत है। आरबीआई की प्रमुख प्राथमिकता देश की बैंकिंग व्यवस्था को बचाने की होनी चाहिए, क्योंकि यहां कोई बड़ा संकट शुरू हुआ तो किसी संभावना का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। ऐसे में धूर्त, चालाक, धोखेबाज और अक्षम कारोबारियों के विपरीत बहुत सारे वास्तविक उद्यमी भी धंधा बिल्कुल न चल पाने के कारण कर्ज वापसी को लेकर हाथ खड़े करने को मजबूर हो सकते हैं। इसके संकेत कई तरफ से मिल रहे हैं। इन स्थितियों पर नियंत्रण भी जरूरी है।
अर्थव्यवस्था के जानकारों के अनुसार भारतीय अर्थ व्यवस्था को स्वस्थ करने के लिये जरूरी है कि हम अपने बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं को पटरी पर लाने के सकारात्मक प्रयत्न करें। पिछले कई सालों से बड़े कर्जों के डूबने की स्थितियों ने हमारी बैंकिंग प्रणाली को तबाह कर दिया हैं। कुछ बड़े कारोबारी बैंकों से भारी-भरकम कर्ज लेकर विदेश भाग गये हैं, तो कुछ दिवालिया घोषित हो चुके हैं या इसके करीब पहुंच रहे हैं। सख्ती एवं तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद कर्जे की वसूली सपना ही बनी हुई है, जो अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने की एक बड़ी बाधा है। सरकारी बैंकों या बीमा कंपनियों में लगा धन एकाधिकारी, व्यावसायिक घरानों की खिदमत और बढ़ोतरी के लिए इस्तेमाल होना भले ही आर्थिक विकास की सुनहरी तस्वीर प्रस्तुत करता हो, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से आर्थिक तनाव, हिंसा एवं असंतुलन का बड़ा कारण है। जिससे सामाजिक चेतना या न्याय भावना आहत होती है। इस बड़ी विसंगति एवं विडम्बना को दूर करने के लिये नरेन्द्र मोदी की आर्थिक नीतियों में छोटे व्यापारियों, कृषि एवं ग्रामीण उद्योगों को ऋण देने एवं स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने के उपक्रम हो रहे हैं। लेकिन बैंकों के आर्थिक भ्रष्टाचार को नियंत्रित किये बिना मोदी की आर्थिक नीतियों को भी गति नहीं दी जा सकेगी। लोकतांत्रिक तत्वों से परिपूर्ण आर्थिक निर्णयों की खोज भी कम मुश्किल काम नहीं है।
कोरोना महामारी एवं उसके बढ़ते प्रकोप के कारण अर्थव्यवस्था हिल गई है, आर्थिक जीवन ठहर सा गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 लाख करोड़ की योजनाओं की घोषणा के साथ राष्ट्र को संबोधित किया ताकि बाजार जीवन्त हो उठे, उद्योग ऊर्जावान हो जाये, ट्रेड बढ़ जाये, कृषि में नयी संभावनाएं जागे, ग्रामीण आर्थिक योजनाओं को बल मिले और भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाये। लेकिन दूसरी ओर कोरोना ने पूरे समाज को निठल्ला भी बना दिया है। आम नागरिकों और सम्पन्न तबके के बीच की खाई गहरी हो गई है, गरीब की गरीबी बढ़ी है तो अमीर अपनी अमीरी को कायम रखने में सफल रहा है, ज्यादा मार मध्यम वर्ग की हुई है। कोरोना ने निर्धन को केवल आँसू दिये हैं और धनवान को धन देने के बावजूद जीवन के लुत्फ उठाने वंचित किया है। इन विकट स्थितियों के बीच संतुलित आर्थिक विकास की तीव्र अपेक्षा है। मोदी की आर्थिक नीतियों एवं प्रक्रियाओं का निरंतर जारी रहना बदलाव के संघर्ष को दिन-प्रतिदिन सरल बनाये, व्यावहारिक बनाये, यह आत्म निर्भर भारत की प्राथमिक अपेक्षा है। जरूरत यह भी है कि मजदूरों-कर्मचारियों के काम और उनके वेतन की गारंटी की जाए और उनमें यह भरोसा कायम किया जाए कि उनकी नौकरी आगे भी बची रहेगी। ज्यादातर दफ्तरों-कारखानों-व्यापारिक गतिविधियों को बंद होने से रोका जा सका तो बाजार का संकुचन ज्यादा नहीं खिंचेगा और भारत लंबी मंदी का शिकार होने से बच जाएगा। जाहिर है, देश के सामने आर्थिक संकट बहुत बड़ा है, लेकिन एक अच्छी बात भी है कि सुरंग के दूसरे छोर से रोशनी की किरणें दिखनी बंद नहीं हुई हैं, विश्व की रेटिंग एजेन्सियों तक वह रोशनी पहुंचेगी और उनके आकलन भी बदलेंगे।

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