दबाव बनाकर खबरें रुकवाने का प्रयास करता स्थानीय प्रशासन


गोविन्द दुबे DG News।

नागरिकों के हित में और सरकारी गड़बड़ी के ख़िलाफ़ ख़बरें लिखने और दिखाने पर मीडियाकर्मियों पर क़ानूनी कार्रवाई की जा रही है। सत्ता में बैठे लोग मीडिया को सिर्फ़ अपने प्रचार-प्रसार का माध्यम समझ रहे हैं। इस कठोर समय में पत्रकार संगठनों की आवाज़ भी कमज़ोर पड़ रही है। ऐसे में सत्ता से सवाल करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता जा रहा है।

ज़िले में काम कर रहे संवाददाताओं पर स्थानीय प्रशासन दबाव बनाकर ख़बरें रुकवाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में कई प्रश्न उठ रहे हैं? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था बिना सशक्त मीडिया के सम्भव है? प्रदेश के विभिन हिस्सों से पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की ख़बरें आ रही हैं,लेकिन दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? ऐसे हालात में क्या भविष्य में स्वतंत्र पत्रकारिता संभव है विगत घटना प्रभुराम चौधरी स्वस्थ मंत्री से सड़क मार्ग भूमि पूजन के दौरान पत्रकार अंबुज महेश्वरी के प्रश्न के विरुद्ध पुलिस कप्तान रायसेन का अंबुज महेश्वरी को रोकने का प्रयास किया जाना , उदयपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डाक्टर विजय लक्ष्मी वर्मा का पत्रकारों के विरुद्ध कार्रवाई की धमकी देना, रेत माफिया राजेन्द्र सिंह रघुवंशी के सहायक माधव सिंह सिकरबार द्वारा रितिक जैन बाड़ी साधना संवाददाता को जान से मारने की धमकी देने के समाचार प्राप्त हुए हैं। वहीं पर कुछ अधिकारी तो पत्रकारों को तब्बजों देना भी उचित नहीं समझते उदयपुरा जनपद पंचायत में जनपद सीईओ अपूर्वा सक्सेना है जोकि तबादला हों जानें के उपरांत भी जमीं हुई है और पत्रकरों को अपेक्षित करतीं हैं मैडम के व्यवहार से राजनीतिक संरक्षण मिलने की पुष्टि होती है

रायसेन जिले के खरगोन के वैष्णव कोचिंग सेंटर की घटना जिसमें बाड़ी बीआरसी स्पष्ट रूप पत्रकार को मारने की बात कही गई थी जिसका सभी पत्रकार महासंघ ने रायसेन पहुंच कर कलेक्टर महोदय को ज्ञापन भी सौंपा था मीडिया में भी काफ़ी चर्चा हुई,लेकिन दोषी अधिकारियों के कोई कार्यवाही होती नहीं दिख रही है, बरेली उदयपुरा पत्रकारों ने गहन चिंता जताई है

कई दशकों से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार भी मानते हैं की मध्यप्रदेश में पत्रकार संगठनों की आवाज़ कमज़ोर पड़ती जा रही है।

बीबीसी हिंदी के पूर्व ब्यूरो चीफ रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं सरकार को आलोचना पसंद नहीं है। इसीलिए पुलिस का दुरुपयोग कर पत्रकारों को फ़र्ज़ी मुक़दमे में फँसाया जा रहा है, संगठन कमज़ोर हो गए इसी लिए शासन-प्रशासन पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने की हर संभव कोशिश कर रहा है।

इसके अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता को रोकने के लिए मीडिया घरानों और समाचार संपादकों पर दबाव बनाकर कर भी मीडिया पर नियंत्रण करने की निरंतर कोशिश की जा रही है।

वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि मौजूदा दौर में ज़मीन पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की समस्याएँ बढ़ी हैं। बुनियादी मुद्दों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की परेशनियाँ बढ़ रही हैं। जो सरकार के विरुद्ध लिख रहा है, उस पर मुक़दमे किए जा रहे हैं।

कलहंस कहते हैं अब केवल ज्ञापन देने और सोशल मीडिया पर ट्वीट करने से समस्या हल नहीं होगी।

अब तो सूचना के अधिकार से भी पत्रकारों को सही जानकारी नहीं मिल रही है। अधिकारी पत्रकारों को मिलने का समय भी नहीं देते हैं और अप्रिय ख़बरों पर दबाव बनाने की कोशिश भी करते हैं।

सही मंच पर शिकायत हो, कार्रवाई नहीं

कई पत्रकार मानते हैं की अगर ख़बर पर कोई आपत्ति है तो उसकी सही मंच पर शिकायत करना चाहिए है, क़ानूनी कार्रवाई करना ग़लत है।

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के पूर्व अध्यक्ष प्रांयशु मिश्रा कहते हैं कि अगर किसी ख़बर पर आपत्ति है तो उसकी शिकायत प्रेस काउन्सिल ऑफ़ इंडिया में या एडिटर गिल्ड में होनी चाहिए है। सही मंच पर शिकायत न करके पत्रकार के विरुद्ध कार्रवाई करना मीडिया की स्वतंत्रता पर खुला हमला है।

प्रांयशु कहते हैं कि सबसे ज़्यादा ज़िला संवाददाताओं को निशाना बनाया जा रहा है, क्यूँकि वह समाचारपत्रों और टीवी चैनल के लिए ख़बर का एक महत्वपूर्ण ज़रिया होते हैं। कई दशक से मीडिया में काम कर रहे प्रांशु कहते है की अगर पत्रकारों पर कार्रवाई का सिलसिला नहीं रुका तो लोकतंत्र को बड़ा नुक़सान होगा।

पत्रकार संगठनों नेशनल मीडिया फाउंडेशन नई दिल्ली अध्यक्ष राजेंद्र जैन आईसना संगठन अध्यक्ष अवधेश भार्गव समाज सेवी अधिमान्य पत्रकार महासंघ अध्यक्ष अनिल मालवीय के द्वारा की संगठनात्मक ख़ामोशी को घातक बताया गया हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार और अधिकारी केवल उन पत्रकारों को पसंद करते हैं, जो उनके कामों की सराहना करते हैं। जो पत्रकार स्वतंत्रता से काम करते हैं और सरकार की आलोचना करते हैं उनको मुक़दमों में फंसाया जा रहा है। अगर पत्रकार संगठन इसके विरुद्ध नहीं खड़े हुए तो यह पत्रकारिता और लोकतंत्र दोनो के लिए घातक होगा।

पत्रकार संगठन भी मानते हैं आवाज़ कमज़ोर पड़ीं है

इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के उपाध्यक्ष तिवारी कहते हैं की शासन और प्रशासन ने कई बार आश्वासन दिया लेकिन किसी पत्रकार पर से अभी तक मुक़दमा नहीं हटा है। उन्होंने कहा लगता है सरकार ख़ुद दोषी अधिकारियों को बचाना और पत्रकारों को फंसाना चाहती है। तिवारी इस बात को स्वीकार लेते हैं कि पत्रकार संगठनों की आवाज़ में असर कम हुआ है। उनका कहना है की पत्रकारों को एकजुटता से मौजूदा माहौल को बदलना होगा।

आख़िर कमज़ोर क्यूँ पड़े पत्रकार संगठन?

पत्रकार संगठन के स्वर कमज़ोर पड़ने का ख़ामियाज़ा सभी श्रमजीवी पत्रकारों को उठना पड़ रहा है। लेकिन यह भी एक बड़ा प्रश्न है कमज़ोर क्यूँ पड़ते जा रहे हैं पत्रकारों में बड़ी संख्या उन लोगों की हो गई है जिनका पत्रकारिता से (लिखने-बोलने) से कोई सरोकार नहीं है।यह लोग सत्ता की मदद से पत्रकारिता में आ गए हैं और मान्यता आदि के सहारे सरकारी दफ़्तरों में निजी कामों के लिए चक्कर लगाते हैं। इस वजह से भी वास्तविक पत्रकारों को काम करने में संकट का सामना करना पड़ रहा है।

मुदित माथुर कहते हैं कई ऐसे बड़े पत्रकार संगठन हैं जिनका वर्षों से चुनाव नहीं हुआ है। कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए संगठनों के पदों को छोड़ना नहीं चाहते है। यह लोग धीरे धीरे सत्ता के क़रीब हो गये हैं और अब पत्रकार हितों की रक्षा की बात करने के बजाय, सत्ता के स्वर से स्वर मिलाने लगे हैं।यहीं लोग अपने स्वार्थ के लिए संगठनों के महत्त्व को कम और पत्रकार आंदोलन को कमज़ोर कर रहे हैं।
ख़त्म होती खोजी पत्रकारिता

अब देखना यह है की पत्रकार कितनी एकजुटता से हालात का सामना करते हैं। वरना रोज़ एक पत्रकार को निशाना बनाया जायेंगे। अगर ऐसा ही माहौल रहा तो शायद स्वतंत्र पत्रकारिता का धीरे धीरे गला घोंट दिया जाएगा और नागरिकों के मुद्दे उठाने वाले ख़त्म हो जाएँगे

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