श्री विग्रह का नवरात्रि के शुभ पर्व पर माँ भगवती का सातवें दिवस का दिव्य श्रंगार ।परमहंसी गङ्गाआश्रम झोतेश्वर श्रीधाम, गोटेगोव ,जिला – नरसिंहपुर

कल्याणकारी, पुण्यदायिनी,पापनाशिनी माँ महागौरी की हम सभी पर कृपा बनी रहे…..

माता का फलों से मनोहारी दिव्य सिंगार

अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायिका माँ ललिताम्बा भगवती शारदाम्बा राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी माता के
श्री विग्रह का नवरात्रि के शुभ पर्व पर माँ भगवती का सप्तमी में (सातवें)दिवस का अनूठा का श्रंगार ।

माता का फलों से मनोहारी दिव्य सिंगार

अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायिका माँ ललिताम्बा भगवती शारदाम्बा राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी माता
के
श्री विग्रह का नवरात्रि के शुभ पर्व पर माँ भगवती का सप्तमी में (सातवें)दिवस का अनूठा का श्रंगार ।

नवरात्रि के सातवें दिन देवी दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा- आराधना की जाती है।

🔸 माता के इस स्वरूप की पूजा करने से सभी तरह के पापो से मुक्ति मिलने के साथ व्यक्ति के शत्रुओं का नाश भी हो जाता है। नवरात्रि के सातवें दिन मां का स्मरण करने मात्र से ही नकारात्मक शक्तियों का नाश हो जाता है।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। इनका रूप भयानक है सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है।

🔸 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार चण्ड-मुंड और रक्तबीज नाम राक्षसों ने भूलोक पर हाहाकार मचा दिया था तब देवी दुर्गा ने चण्ड – मुंड का संहार किया परन्तु जैसे ही उन्होंने रक्तबीज का संहार किया तब उसका रक्त जमीन पर गिरते ही हज़ारों रक्तबीज उतपन्न हो गए। तब रक्तबीज के आतंक को समाप्त करने हेतु मां दुर्गा ने लिया था मां कालरात्रि का स्वरुप। मां कालरात्रि काल की देवी हैं।

🔸 इस देवी के तीन नेत्र हैं। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। ये गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो और बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है।

🔸 माता काली को गुड़हल का पुष्प अर्पित करना चाहिए। कलश पूजन करने के उपरांत माता के समक्ष दीपक जलाकर रोली, अक्षत से तिलक कर पूजन करना चाहिए और मां काली का ध्यान कर वंदना श्लोक का उच्चारण करना चाहिए| तत्पश्चात मां का स्त्रोत पाठ करना चाहिए। पाठ समापन के पश्चात माता जो गुड़ का भोग लगा लगाना चाहिए। तथा ब्राह्मण को गुड़ दान करना

ॐ देवी महागौर्यै नम:श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभ दघान्महादेवप्रमोददा॥

ॐश्रीक्लींह्रींवरदायैनम:

DGNews – Reporter
Deepak sarathe
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