कांग्रेस द्वारा लगाए गए गद्दारी के आरोपों को जनता ने किया अस्वीकार

मध्यप्रदेश के राजनितिक इतिहास के सबसे बड़े उपचुनावों में भाजपा को मिली शानदार विजय ने कांग्रेस के बाग़ी ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कांग्रेस द्वारा लगाए गए ‘गद्दारी’ के आरोपों को जनता ने अस्वीकार कर दिया है .प्रदेश में हुए २८ सीटों के उपचुनाव के नतीजे तमाम सर्वेस्खनों को धता दिखाते हुए सामने आये हैं .इन उपचुनावों में ‘विकास कोई मुद्दा नहीं था.मुद्दा था ‘गद्दारी’और ‘ खुद्दारी’ .जनता ने खुद्दारी को अपना समर्थन दिया .
सिंधिया डेढ़ साल पहले चुनी गयी कांग्रेस की सरकार को ठुकराते हुए अपने 22 समर्थकों के साथ भाजपा में आये थे ,उनके बाद तीन और कांग्रेसी विधायक भाजपा में आगये थे .ग्वालियर चंबल अंचल से 16 विधायक थे,शेष प्रदेश के दुसरे हिस्सों से थे .जनता ने बागियों में से कुछ को अस्वीकार किया लेकिन बाक़ी को अपना समर्थन दिया और उन्हें दोबारा विधानसभा के लिए चुन दिखाया .भाजपा के टिकिट पर लाडे जो बाग़ी चुनाव हारे हैं उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं,उनके नेता नहीं और जो जीते उसके लिए उनका जनाधार तथा उनके नेताओं की पुण्याई काम आयी .
मुझे लग रहा था की विधानसभा के ये चुनाव प्रदेश में सरकार के स्थायित्व के लिए संकट न बन जाये किन्तु चुनाव नतीजों ने मेरी इस आशंका को निर्मूल कर दिया है .अब आने वाले दिनों में भाजपा को सरकार चलाने के लिए किसी विधायक को अपने साथ रखने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की जरूरत नहीं पड़ेगी.इन उपचुनावों के नतीजों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के नए प्रदेशाध्यक्ष बीड़ी शर्मा को भी नवजीवन दिया है. ये चुनाव कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हुए हैं .कांग्रेस को अपनी 25 सीटें बचना थीं लेकिन कांग्रेस बामुश्किल आधा दर्जन सीटें ही बचा सकी .
अब बेहतर हो की कांग्रेस आने वाले दिनों में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका को स्वीकार कर लेना चाहिए .प्रदेश में कांग्रेस को बचने के लिए एक बार फिर जनता द्वारा खारिज किये जा चुके कमलनाथ और दिग्विजय को कांग्रेस कार्यालय से बाहर कर दिया जाना चाहिए .इन नेताओं की बदजुबानी ही कांग्रेस को भारी पड़ी है ..विधानसभा के ऐतिहासिक उप चुनाव प्रदेश की राजनीति में मील का एक नया पत्थर जैसे हैं क्योंकि ये चुनाव जहाँ बगावत को मान्यता दे रहे हैं वहीं सिंधिया खानदान को गद्दारी के आरोपों से भी बरी भी कर रहे हैं .अब भविष्य में किसी राजनितिक दल के पास सिंधिया परिवार को 163 साल पहले के कथित अपराध के लिए कोसने का अवसर नहीं बचता .बाक़ी इतिहास अपनी जगह है और वर्तमान अपनी जगह .जीते हुए प्रत्याशी बधाई के पात्र हैं .जो हारे हैं उन्हें भी निराश नहीं होना चाहिए .राजनीति में सब कुछ अस्थाई होता है .

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