कुछ दल बदलु नेताओं को मिला जन समर्थन परंतु कुछ कहता है मेरा दिल

मप्र मेें हुए 28 विधानसभाओं के चुनाव परिणाम तो प्रत्याशित हैं लेकिन जीत-हार का अंतर जबरदस्त रूप से चौंका रहा है। हैरत है कि जो प्रत्याशी कल तक कांग्रेस में थे और विजयी भी हुए थे, वे जब दलबदल कर धुर विरोधी भाजपा में चले आये, तब भी उनके प्रति जन समर्थन में कुछ अंतर नहीं आया, बल्कि वह उनके प्रति बढ़ गया। यह क्या दर्शाता है? क्या जनता ने पिछले चुनाव में कांग्रेस को समर्थन प्रसंगवश दे दिया था? क्या उसके लिये दल नहीं प्रत्याशी मायने रखता है? क्या दलबदल को वह राजनीतिक कवायद मानता है, न कि निष्ठा का पैमाना?
राजनीति के रंगढंग बदल चुके हैं, इसमें दो राय नहीं । चंद बुद्धिजीवी, खबरनवीस,विश्लेषक सार्वजनिक जीवन में नीति,नियम,उसूल,आदर्श की बातें भले कर लें, जब उनका मौका आया है, तब उनमें से भी ज्यादातर मौका परस्ती करने से नहीं चूकें। ऐसे में राजनीति जैसे मलाईदार पेशे में यदि आदर्श के भरोसेे कोई बैठा रहा तो वह बैठा ही रह जायेगा, यह सोलह आने सच है। तब हम दिखावे के लिये सिद्धांत की बातों पर क्यों अटक जाते हैं? मजा यह है कि ऐसा बुद्धि विलास राजनीतिक दलों की ओर से ही ज्यादा होता है, ताकि जनता के बीच यह भ्रम बना रहे कि वहां शुचिता बची है।
मध्यप्रदेश की राजनीति में फरवरी 2020 से प्रारंभ हुई उठापटक के दिलचस्प नजारे देश-प्रदेश की जनता ने नौ महीने तक जी भरकर देखे। पूरे महीने होने के बाद हुई प्रसूति मेें जो शिशु आया है, वह नया संदेश लाया है। यह शिशु मुंह में अंगूठा रखकर घुटने-घुटने नहीं चलने वाला, बल्कि सीधे सिंहासन की सवारी करेगा। यह इक्कीसवीं सदी है तो इसके पैमाने,पसंद,परिणाम भी अलग ही होंगे।
आम तौर पर माना जाता है कि उप चुनाव में सत्तारूढ़ दल को नुकसान उठाना पड़ता है। उसकी मुश्किल तब बढ़ जाती है जब वह दलबदल कर आये व्यक्ति को ही अपना उम्मीदवार बनाता है। इन चुनाव ने इस मिथक तो कुचल दिया। सिंधिया के साथ 19 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ी थी, जिन्हें भाजपा ने टिकट दिया था। इसमें से उनके 6 समर्थक हारे और 13 जीते हैं। दलबदल के बाद जो 13 प्रत्याशी जीते हैं, उनमें से ज्यादातर का प्रतिद्वंद्वी से अंतर इतना बढ़ गया कि वे खुद हैरत में होंगे। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि उन्हें कांग्रेस के पारंपरिक वोट तो मिले ही, भाजपा में भी वे सहर्ष स्वीकार कर लिये गये। जो आशंका भाजपा के निष्ठावान वोटों में कमी होने की थी, वो निरर्थक साबित हुई।
भारतीय राजनीति के चरित्र मेें आये इस परिवर्तन का भविष्य पर भी असर होगा ही। वोटों का बढ़ा हुआ यह अंतर इतना अधिक है कि भाजपा नेतृत्व भी चकित तो है ही, उससे खुश भी होगा। उसे लग रहा है कि जिन लोगों का राजनीतिक कायांतर हुआ है, वे अपने साथ अपने वोट बैंक की दौलत भी लाये हैं। भाजपा यह प्रयोग कांग्रेस व दूसरे विरोधी दलों की सरकार वाले राज्यों में करने का जोखिम दोहरा सकती है।
जीते हुए ये प्रत्याशी नि:संदह अपने-अपने इलाकों में निजी वर्चस्व बनाये हुए हैं, जो परिणामों में परिलक्षित हुआ है। सांची से प्रभुराम चौधरी 63,809 वोटों से जीते, जो कांग्रेस के टिकट पर पिछला चुनाव 10,813 वोटों से ही जीते थे। याने दलबदल के बावजूद 53 हजार अधिक लोगों का समर्थन मिला । इसी तरह दूसरी विशाल जीत के प्रतीक बने तुलसी सिलावट पिछली बार सांवेर से कांग्रेस के टिकट पर मुश्किल से 2,945 वोटों से जीत दर्ज कर पाये थे। वे इस बार 53,264 वोटों से जीते हैं। याने 51 हजार का नया जन समर्थन उन्हें मिला है। ऐसा कमोबेश ज्यादातर सीटों पर भी हुआ है, जो कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आये हैं। यूं कुछ सीटों पर वे प्रत्याशी हारे भी हैं जो पहले कांग्रेस से लड़े थे और इस बार भाजपा के पाले में थे। रक्षा सिरौनिया पिछला चुनाव 39,896 वोटों से कांग्रेस से जीती थीं, वे भाजपा में नाममात्र 51 वोट से विजयी हो पाईं।
इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जहां प्रत्याशी का निजी संपर्क, व्यवहार,कार्य प्रणाली अच्छी थी, वहां उसे भाजपा के वोट तो मिले ही, साथ में कांग्रेस के वोट बैंक में भी सेंधमारी कर ली। जबकि, केवल पार्टी के भरोसे जिनकी नैया पार लगती थी और निजी तौर पर वे अपना प्रभाव पैदा करने से चूक गये, वे पिछड़ गये। इमरती देवी इसका बड़ा उदाहरण है। वे पिछला चुनाव 57,446 वोटों से जीती थी, जो इस बार 7,633 वोटों से पराजित हुईं हैं। याने 64 हजार मतदाता उनके खिलाफ रहे हैं।
ऐसा लगता है, इस फरवरी से प्रारंभ राजनीतिक घटनाक्रम को कांग्रेस निजी दुश्मनी से आगे देख ही नहीं पाई। ऐसा लगा जैसे कांग्रेस के सामने अपने दल की नीति, योजनाओं की बजाय सिंधिया का सियापा ज्यादा महत्वपूर्ण रहा। इन चुनावों ने एक बात की तस्दीक भी की कि सिंधिया का मान-सम्मान कांग्रेस में वाकई नहीं बचा था। कुछ लोग कांग्रेस को जेबी पार्टी बनाने पर तुले थे और सिंधिया को महत्वहीन करने और अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। समूचा चुनाव काल देखें तो सिंधिया पर निरंतर हमले के अलावा कुछ हुआ ही नहीं । कांग्रेस के इस एक सूत्री अभियान ने यह भी साबित किया कि सिंधिया के भीतर जो छटपटाहट थी, वह कितनी वाजिब थी।
इसमें संदह नहीं कि प्रचार तंत्र का उपयोग जिस तरह से कांग्रेस ने किया, उसने उसकी विश्वसनीयता को संदेहास्पद बना दिया। अदने से लेकर तो बड़े नता तक एक ही सिंधिया राग आलाप रहे थे। ये बयानवीर अभी-भी बाज नहीं आ रहे हैं और अपनी पराजय की समीक्षा करने की बजाय सिेधिया के हारे प्रत्याशियों का उपहास उड़ाने में लगे हैं। इन आत्म मुग्ध लोगों ने ही कांग्रेस को बरबाद किया है। इसे कांग्रेस नेतृत्व जितनी जल्दी समझ जायेगा, उतना ही उसमें अपना जनाधार बढ़ाने का माद्दा पैदा होगा, वरना अगले चुनाव के परिणाम उसे फिर से 2003 की स्थिति में पहुंचा देंगे।

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