सरकार द्वारा चार पांच शहरों में रात को 10 बजे से सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगाया गया

सरकार द्वारा चार पांच शहरों में रात को 10 बजे से सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगाया गया है अब रात को 10 बजे से सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगाने के पीछे मेरे को तर्क समझ में नहीं आ रहा कम पढ़ा लिखा हूं ज्यादा नहीं समझ पाता दुकाने जल्दी बंद करने शादियों को 10 बजे से पहले करने जैसी बातें अटपटी लग रही है आखिर कोरोना कोई इंसान तो है नहीं है जो समय देखकर आएगा अगर समय के हिसाब से कोरोना आ रहा होता तो पूरे देश में कोरोना दिन में घूमने वालों को क्यों होता जा रहा है अब सरकार का निर्णय है जो सर आंखों पर है,कोरोना को लेकर केवल गिने-चुने लोगों पर बंदिश हो जाती है शराब की दुकानें देर तक खुलती हैं पटाखे चलाने का समय निर्धारित नहीं किया जाता पटाखे चलाने की अनुमति दी जाती है पेड़ काटने वालों पर कुछ नहीं हो रहा कचरा जलाने वाले खुले आम घूम रहे हैं कोरोना हो या कोई भी बीमारी जब तक प्रदूषण को नहीं रोका जाएगा तब तक जनता इसी प्रकार से बीमारियों का सामना करते हुए इलाज कराएगी या दुनिया को छोड़ जाएगी इसके लिए सबसे पहले जरूरी है हमें उन सब चीजों को रोकना है जो पर्यावरण को नुकसान कर रही हैं जैसे किसान भाई पराली जलाना छोड़ें शहर के जो भाई दिन भर फालतू वाहन चलाते रहते हैं उसको रोकें घरों के आसपास जो कचरा जला देते हैं फैक्ट्रियों के मालिक प्रदूषण नियमों का पालन नहीं करते इन सब चीजों को रोकने की जिम्मेदारी सरकार और हमारी है अन्यथा जिस प्रकार से स्त्री फिल्म में भूतनी से बचने के लिए घर घर पर लिख दिया गया था “इस्त्री कल फिर आना या कुछ लोगों ने महिलाओं का रूप धारण कर लिया था क्योंकि स्त्री केवल पुरुषों को ले जाती थी शायद इसी तर्ज पर हमारी सरकार भी कोरोना को रोकने को लेकर अलग-अलग इस प्रकार के आदेश कर रही है जिसका कोई मतलब समझ में नहीं आता सरकार से उम्मीद है की जनता को उचित इलाज के साथ उचित चीजों का पालन करने हेतु बाध्य किया जाए क्योंकि बीमारी न तो समय देखकर आती है न जाति न धर्म देखकर आती है बीमारी तो सर्वधर्म समभाव वाली होती है बीमारी किसी को भी लगती है और किसी को भी साथ ले जाती है “केवल दीवाल पर लिखने से न तो इस्त्री छोड़ती है न ही रात को 10 बजे से कर्फ्यू लगाने पर कोरोना से बचत हो पाएगी” इसके लिए हम सबको पूरे दिन हमें सुरक्षा रखना होगी “#तो स्त्री तू कल फिर आना जैसे शब्द कहीं ना कहीं हंसी के पात्र बन जाते हैं इसको देखने की जरूरत है.

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