मेघा परमार ओर भावना परमार बनी बेटियों की प्रणा स्त्रोत

मेघा परमार पर्वतारोही
भावना डेहरिया पर्वतारोहि

भोपाल से सुरेश मालवीय की रिपोर्ट

भोपाल । मप्र की बेटियां मेघा परमार और भावना डेहरिया ने अपने हौसलों के बल पर दुनिया में अपनी धाक जमा ली है। दुनिया की 8,848,86 मीटर की सबसे ऊंची माउंट एवेरेस्ट की चढ़ाई करने वाली मेघा और भावना ने प्रदेश की बेटियों कर मंजिल को नई दिशा दी है। सिर्फ माउंट एवेरेस्ट की चढ़ाई ही नहीं, दुर्गम और दुष्कर चढ़ाई पर जाकर इन दोनो बेटियों ने नया इतिहास तो लिखा ही है, शिखर पर पहुंचने के लिए लड़कों की तरह ही सभी तरह की चुनौती स्वीकार की है। अंत में उनके जज्बे को उस वक्त सफलता मिली, जिसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। इंटरनेशनल माउंटेन डे पर मेघा परमार और भावना डेहरिया ने अपनी कहानी शेयर कर प्रदेश की बेटियों को नई ऊर्जा दी है। मध्य प्रदेश के सिहोर के गांव भोजनगर की मेघा परमार और मध्य प्रदेश के ही छिंदवाड़ा की भावना डेहरिया का यह कारनामा सुनहरे अक्षरों से लिखा जा चुका है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट 8,848,86 मीटर पर चढ़ाई की कहानी बताते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर वे किस तरह शिखर पर पहुंचीं। मेघा और भावना कहती हैं कि हम जब हाई एल्टीट्यूड पर पहुंचते हैं तो वहां ऑक्सीजन बहुत कम होती है। हम बेस कैंप पहुंचते हैं, जो 5645 मीटर की ऊंचाई पर होता है। यहां व्यक्ति के काबू में कुछ नहीं, शरीर जवाब देने लग जाता है। हार्ट रेट बढ़ जाता है और दिल बहुत तेजी से धड़कने लगता है। बावजूद इसके एक संतोष और खुद पर गर्व महसूस होता है। दो महीनों की इस यात्रा को पूरा करने के लिए चार कैंप के जरिए यात्रा का पूरा किया जाता है। यात्रा के लिए हमारे पास मैटल की प्लेटयुक्त विशेष प्रकार के जूते होते हैं जिनका वजन ही दो-दो किलो के लगभग होता है। दिन में हिमस्खलन की अधिकता के चलते क्लाइंबिंग करने के लिए रात का वक्त चुना जाता है। साथ ही सबसे कठिन कुंभ ग्लेशियर को पार करना भी चुनौती से भरा होता है, लेकिन शिखर पर पहुंचकर महसूस होता है जैस वक्त ठहर गया हो। हमारा मस्तक चमकने लगता है।

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