आधुनिक हिन्दी गद्य को गढ़ने का किया था काम, पहला ही उपन्यास रहा बहुचर्चित

हिन्दी को ऊंचाइयों पर ले जाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा जिले के साहित्यकार ठा. जगमोहन सिंह का

भारतेन्द्रु हरिशचंद्र भी मिलने आते थे विजयराघवगढ़ की शांति कुटीर में

कटनी- कटनी जिले की माटी में जन्में उच्चकोटी के विद्वानों का याद किया जाए या साहित्य साधना पर नजर डाली जाए तो विजयराघवगढ़ के राजघराने के ठा. जगमोहन सिंह को भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को ऊंचाईयों में ले जाने का कार्य किया है। विद्वान भारतेन्द्रु हरिशचंद्र जैसे देश के साहित्य साधक उनके साथी रहे हैं और उन्होंने भी उनकी लेखनी की सराहना की थी। ठा. जगमोहन सिंह ने जहां आधुनिक हिन्दी गद्य को गढ़ने का काम किया तो वर्ष 1988 में आया उनका पहला ही हिन्दी उपन्यास श्यामा स्वप्न बहुचर्चित उपन्यास रहा।

बनारस से हुआ था साहित्य प्रतिभा का उदय

तत्कालीन विजयराघवगढ़ रियासत के राजकुमार ठा. जगमोहन सिंह का जन्म 4 अगस्त 1857 को हुआ था। शिक्षा के लिए 9 वर्ष की आयु में बनारस के क्वीन्स कालेज में भर्ती कराया गया। यहीं से उनकी साहित्यिक प्रतिभा का उदय हुआ और भारतेन्दु हरिश्चन्द से मित्रता हुई, जो प्रगाढ़ मैत्री में बदलकर आजीवन कायम रही। जिले के वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र सिंह बताते हैं कि अपनी शिक्षा पूर्ण कर गृहनगर विजयराघवगढ़ लौटने पर श्री सिंह ने झपावन नदी के किनारे भारत बाग नामक सुन्दर उद्यान लगवाया और इसके बीच में शांति कुटीर के नाम से छोटी सी कोठी बनवाई, जिसमें बैठकर वे साहित्य साधना करते थे। समय-समय पर साहित्यिक मित्र तो उनसे मिलने आते ही थे, भारतेन्दु हरिशचंद्र भी बनारस से चलकर अपने मित्र से मिलने और शांति कुटीर में कई दिन रहकर साहित्य साधना करते थे। भारतेन्दु की एक रचना में जबलपुर यात्रा का उल्लेख है, जो मूलतः विजयराघवगढ़ की ही यात्रा थी।

कालीदास के मेघदूत व ऋतु संहार का हिन्दी में उत्कृष्ट अनुवाद

साहित्यकार ठा. जगमोहन सिंह ने जहां हिन्दी साहित्य को नया आयाम देने में योगदान प्रदान किया, तो वहीं कालीदास के संस्कृत में लिखे गए साहित्य मेघदूत और ऋतु संहार का भी उन्होंने हिन्दी में उत्कृष्ट अनुवाद किया। जिससे लोगों को कालीदास की रचना को हिन्दी में समझने का अवसर मिला। अंग्रेज सरकार ने उन्हें धमतरी में तहसीलदार के पद पर पदस्थ किया था। छत्तीसगढ़ में रहते हुए उन्होेंने वहां के साहित्यकारों का भी एक मंडल बनाया और स्थानीय हिन्दी साहित्य को नई दिशा देने का कार्य किया। ठा. जगमोहनसिंह का निधन वर्ष 1899 में इस संसार को अलविदा कह गए लेकिन हिन्दी साहित्य के लिए उनका योगदान हमेशा स्मरणीय रहेगा।

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