हिंदी पत्रकारिता दिवस : यदि आपका मन किसी को गाली बकने का है तो आप पत्रकारों को बक सकते हैं…


एक ज़माना था जब समाज में पत्रकारों का बहुत सम्मान हुआ करता था। उसकी वजह यह थी कि तब पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी और पत्रकार भी अपने आपको समाज का प्रतिनिधि मानता था एवं समाज की आवाज़ बन कर सत्ता की बुलंदियों को ललकारता था, उसकी ईमानदारी ही उसकी सबसे बडी़ ताक़त होती थी।
लेकिन अब सब कुछ बदल गया है, पत्रकारिता अब प्रोफेशन बन गयी है। क्योंकि आज के पत्रकार को उसकी अनावश्यक ज़रूरतों ने उसे सत्ता का गु़लाम बना दिया है। पहले के पत्रकार भूखे पेट और फटे कपडो़ में भी अपनी शान समझते थे और मस्त रहते थे एवं आज का पत्रकार सब कुछ होते हुए भी ज़मीर बेचने की जुगत में दिन रात लगा रहता है जमीर बेचने के बाद भी उसकी ज़रूरते पूरी नहीं होती हैं।
यही वजह है किसी दौर में सम्मान का प्रतीक रहा पत्रकार आज समाज में नफ़रत का पात्र बन चुका है । कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा किसी भी पत्रकार को कठघरे में खडा़ कर देता है।
अब तो लोग मजा़क़ में यहां तक कहने लगे हैं कि अगर आपका किसी को गाली बकने का मन है तो आप पत्रकार को बक सकते हैं।
बहरहाल इन हालत के लिए कुछ हद तक जि़म्मेदार हम खुद भी हैं क्यों कि हम चंद सिक्कों की लालच में नीलाम होने के लिए बाजा़र में खडे़ हुए हैं। इसी लिए ग़लत करने वालों पर उंगली उठाने का ना तो हमारे पास अधिकार है और ना हिम्मत है।

जय हिंद

समाजसेवी अधिमान्य पत्रकार महासंघ

संवाददाता प्रमोद चौरसिया करकबेल

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