किसी भी देश की समृद्धि व सफलता में वहां की भाषा विशेष योगदान रखती हैं….

जयतु संस्कृतम जयतु भारतम
लेखिका-निवेदिता सक्सेना
सँस्कृत नाम दैवी वागंवाख्याता महर्षिभि:।
भाषासु मधुरा मुख्य दिव्या गिर्वाण भारती।।
भारत भूमि विविध भाषाओं, बोलियों व संस्कृति से परिपूर्ण हैं जहाँ सभी को एक सम्मानीय स्थान प्राप्त होता हैं।वही ज्ञात हो कि एक बीज से पौधा फिर वही वृक्ष का रूप ले लेता हैं जिसकी कई शाखायें निकलकर वृक्ष को मजबूत बनाती हैं, शाखाएं अगर उससे अलग हो तो वह नष्ट हो जाती हैं ।


वैसे ही भारत की प्रथम राजभाषा हैं, संस्कृत । तदन्तरम जिसकी लेखन प्रणाली में देवनागरी लिपि व ब्राह्मी लिपि आयी। संस्क्रति व संस्कार भी इसके ही प्रतिरूपित शब्द हैं ।इसमें कोई दो राय नही कि हर बात का तथ्य व प्रमाण होना जरूरी हैं चाहे विज्ञान हो या साहित्य ।देवनागरी लिपि का संबंध आधुनिक युग से है जो वास्तव में संस्कृत से बनी हैं।
संस्कृत जो देवो की भाषा कही जाती हैं इसे आर्य भाषा के नाम से भी जाना जाता हैं । किसी भी देश की समृद्धि व सफलता में वहां की भाषा विशेष योगदान रखती हैं क्योंकि भाषा संवाद के साथ व्यवहार परक होती हैं। यही कारण हैं कि महर्षि पाणिनि ने संस्कृत भाषा पर काफी कार्य किया साथ ही महर्षि कात्यायन व पतंजलि ने अभूतपूर्व योगदान दिया। कहते है ना भाषा तभी सफल हो पाती हैं जब अधिकाधिक व्यवहारिक उपयोग में आये। इन्ही के चलते संस्कृत की पचास लाख पांडुलिपियां हैं जिनमे से अधिकतर अब विदेशों में है। संस्कृत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कंप्यूटर की भाषा के रूप में जाना जाता हैं विभिन्न भाषाएं जैसे उड़िया , मराठी, तमिल ,कन्नड़ व रोमानिया का संस्कृत भाषा से उद्भव हुआ हैं।
वैज्ञानिक भाषा संस्कृत को एक वैज्ञानिक भाषा कहा जाता हैं जो सत्यता को प्रकट करती हैं। संस्कृत बोलते समय जिव्हा व तालु के मध्य तरंगित दबाव उत्पन्न होता हैं जो हमारे केंद्रीय तांत्रिक तंत्र (मस्तिष्क) से परिधीय तंत्रिका तंत्र में कम्पन्न या स्पंदन उत्पन्न करता है जिससे शरीर के सभी धमनी व शिराओं में रक्त परिसंचरण पहले से ज्यादा अच्छा हो जाता हैं जिसके कारण मस्तिष्क को पूर्णतः ऑक्सीजन मिलती रहती हैं। साथ ही शरीर की लगभग सभी कोशिकाए संस्कृत शब्द उच्चारण से प्रभावित होती है एक सकारात्मक पहलू में,मस्तिष्क की ही भांति यह कोशिकाओं को ऑक्सीजन संपन्न करता है। यही कारण हैं नियमित संस्कृत पठन से बुद्धि भी कुशाग्र होती हैं। व व्यक्ति स्वस्थ रहता हैं इसी कारण भारत मे सनातनी प्रातःकाल मंत्र व श्लोक से पूजन कर अपने दिन को महत्वपूर्ण बनाते है ।
यह इसी से ज्ञात होता हैं कि, चरक व सुश्रुत संहिता संस्कृत में लिखी गयी। यहां तक कि अधिकांश आध्यात्मिक ग्रंथ भी संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। संस्कृत एक रहस्यमयी भाषा के रूप में जानी जाती हैं। इन्ही कारणों से नासा में संस्कृत पर आज भी संस्कृत विभाग इस भाषा विज्ञान में खोज का विषय लिए हुए है । यहां तक कि भारत से उद्गमित संस्कृत विदेशों में भी खासी पहचान बनाए हुए है।जैसे -जर्मन, अमेरिका व कनाडा में संस्कृत पढ़ाई जा रही अब तक वहां कई यूनिवर्सिटी में संस्कृत कोर्स में पढ़ाई जा रही, जिसमे सभी सीटे पहले से ही पूर्ण हो जाती हैं लेकिन बात करे भारत की, तो यहां विडंबना है कि जहां से संस्कृत आई ,जहां के ऋषि मुनि इस भाषा में अपने विचार सहज है रख लेते थे और शिष्य समझ जाते थे ,जहां बिना संस्कृत श्लोक बोले दिन की शुरुवात नहीं होती थी ,वहा आज के अधिकांश नौजवानों को और विद्यार्थी को इस भाषा को पढ़ने में भी दिक्कत आती हैं।वे इसे पढ़ने में भी असमर्थ हैं तो फिर समझने कि तो बात ही क्या करे । आज संस्कृत भाषा हिंदी व अंग्रेजी के मध्य विलुप्ति के कागार पर आ गई हैं जहां वर्तमान में भारत के विद्यार्थी इसे मात्र कक्षा में जैसे तेसे नम्बर लाने के लिए पढ़ते रहे। इन्ही कारणों से वे भारत की वैभवशाली संस्कृति से भी अनभिज्ञ रहे ।
लेखन क्षेत्र में आते ही मुझे स्वंय को अपने लेखन में शब्दकोश की कमी का आभास हुआ। लेखन एक ऐसा क्षेत्र हैं, हम इसमें जितना सीखते है कमी का आभास होता रहता हैं। ऐसे में कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने मुझे संस्कृत अध्ययन हेतु प्रेरित किया लेकिन गुरु बिन अध्ययन हो कैसे ।विगत दो वर्षों में कॉरोनाकाल के चलते भारत या कहे विश्व मे ऑन लाइन कक्षाओं के दौर व्यापक रुप् से प्रचलित हुए है, इसी तारतम्य में इस डिजिटल दुनिया में संस्कृत के वेदाचार्य श्री शेषदेव जी मिश्र द्वारा ऑन लाईन कक्षाओ का दौर वर्तमान तक चल रहा। मेंने अनुभव किया कि संस्कृत का नित्य अध्ययन मस्तिष्क को शांत व बुद्धि को तीव्र, याद्दाश्त विकसित करता हैं।
डॉ भीमराव आंबेडकर ने भी कहा था संस्कृत को अधिकारिक भाषा का दर्जा मिलना आवश्यक हैं। इसे संविधान की 8 वी अनुसूची में शामिल किया गया है।
हमारे समाचार पत्र दैनिक चैतन्य लोक में नित्य एक पेज संस्कृत का होता हैं जो हम सभी को नित्य पठन पाठन में मदद करता है।
वही नई शिक्षा नीति में संस्कृत को विशेष स्थान मिला है ।तथा गूगल पर स्थान प्राप्त हुआ । संस्कृत एक कड़ी है मनुष्य को भारतीय संस्कृति से जोड़ने की,अध्यात्म से जोड़ने की।योग से लेकर आयुर्वेद, चिकित्सा जगत सभी आवश्यक व अमूल्य संसाधनों का जिक्र हमारी संस्कृत भाषा अपने में लिए हुए हैं लेखन व पुस्तक रूप मे) बस आवश्यकता है तो उसे समझने की समझाने की ओर जीवन में उतारने की। जरा गौर कीजिएगा ,आपने किया हो या ना हो पर मैने तो किया कि जो तथ्य हम हिंदी या अंग्रेजी भाषा में भी ठीक ढंग से ज्यादा शब्दों में प्रस्तुत नहीं कर पाते वह संस्कृत भाषा में सहज ही अल्प शब्द में प्रस्तुत हो जाता है व प्रभावी भी होता है। उदाहरणार्थ- विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।
भावार्थ: विद्या से विनय अर्थात विवेक व नम्रता मिलती है, विनय से मनुष्य को पात्रता मिलती है यानी पद की योग्यता मिलती है। वहीं, पात्रता व्यक्ति को धन देती है। धन फिर धर्म की ओर व्यक्ति को बढ़ाता और धर्म से सुख मिलता है। इस मतलब यह हुआ कि जीवन में कुछ भी हासिल करने के लिए विद्या ही मूल आधार है।

बस आवश्यकता है तो संस्कृत भाषा को पुनः भारतीय संस्कृति की अभिलाषा से जोड़ने की, दैनिक जीवन में लाने की ।
जिम्मेदारी हमारी
अगर भारत के वैभवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करना है तो इसका अध्ययन अतिआवश्यक हैं।
नई शिक्षा नीति के द्वारा सँस्कृत को पुनः सशक्त बनाना होगा ।
जयतु सँस्कृतम-जयतु भारतम

Editor Neelesh Soni

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