देश की आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए वित्त मंत्री सीतारमण ने दी इंडियन इकोनोमी को बूस्टर डोज

मंदी के माहौल को दूर करने के लिए कॉरपोरेट टैक्स घटाने के वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के फैसले पर उद्योग जगत से लेकर शेयर बाजार ने जैसी उत्साहजनक प्रतिक्रिया व्यक्त की उससे यह अपने आप साबित हो जाता है कि व्यापक असर वाला एक बड़ा कदम उठा लिया गया है। यह फैसला भारतीय उद्योग जगत के साथ वैश्विक कारोबारियों को भी आकर्षित करने वाला तो है ही, आर्थिक सुस्ती को दूर करने और साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति सकारात्मक सोच का संचार करने वाला भी है। इस फैसले के तहत कॉरपोरेट टैक्स 30 फीसदी से घटाकर 22 फीसदी कर दिया गया है। इसके साथ ही मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की नई कंपनियों के लिए टैक्स 25 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी कर दिया गया है।

करीब-करीब सभी यह मान रहे हैं कि इस बड़े फैसले के अपेक्षित परिणाम सामने आएंगे, लेकिन यह सरकार के साथ उद्योग जगत को भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा वास्तव में हो और उसका लाभ आम आदमी को रोजगार के बढ़ते अवसरों के रूप में मिले। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि उद्योग-धंधों की बढ़त के साथ ही रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हों। इससे ही मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था गति पकड़ेगी।

उद्योग जगत एक अर्से से कॉरपोरेट टैक्स में कमी की मांग कर रहा था ताकि वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना कर सके, लेकिन यह मांग पूरी करने के बजाय इस वर्ष आम बजट में ऐसे प्रावधान कर दिए गए जिससे कारोबारी हतोत्साहित हुए। शायद इसी कारण वित्त मंत्री के फैसले को भूल सुधार की संज्ञा देने के साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अपने देश में मुश्किल वक्त में ही बड़े कदम उठाए जाते हैं। यह जरूरी है कि मुश्किल वक्त की आहट समय रहते महसूस की जाए। कॉरपोरेट टैक्स घटाने के फैसले का एक पहलू यह भी है कि इससे सरकारी खजाने में करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये की कमी आएगी।

चूंकि जीएसटी के जरिये अपेक्षित राजस्व की प्राप्ति नहीं हो पा रही है इसलिए सरकार को इसकी चिंता करनी होगी कि उसे आवश्यक धन का प्राप्ति कहां से हो? यह सही समय है कि सरकार विनिवेश प्रक्रिया को गति प्रदान करे। जब सैद्धांतिक तौर पर यह मान लिया गया है कि सरकार का काम उद्योग-धंधे चलाना नहीं तब फिर सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश की दिशा में आगे बढ़ा ही जाना चाहिए। इसके साथ ही एक अर्से से लंबित पड़े श्रम सुधारों और औद्योगिक विवाद से जुड़े जटिल कानूनों की भी सुध ली जानी चाहिए।

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