अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जीवन के अनेक क्षेत्रों में काम कर रहीं स्त्रियों को समर्पित एक पुरानी कविता )

(

।। वह लड़की ।।

कहां चली गई वह लड़की
कोई नहीं करता उसका ज़िक्र
गीत भी चले गए उसके साथ
चला गया गांव का जस

सौदा करने गई थी हाट में
कोई खुद उसे
खरीद ले गया शायद
अबकी ऐसी गई
लौटकर नहीं आई

ऐसी परी तो नहीं थी
फूल सा नहीं था उसका शरीर
बड़ी – बड़ी आंखों
और पतली कमर वाली
वह सांवली-सी लड़की
काले-काले खेतों में खड़ी
गेंहू की हरी बाल थी

पहले भी जाती थी कई बार
चैत काटने
या मजूरी को दूर देश
गांव सोचता था
अबकी न फिरेगी
मर-खप जाएगी कहीं
उठा ले जाएगा जिनावर
या घास काटते वक़्त
डस लेगा उसे सांप

हुलसकर गाते हुए
वह लौट आती थी हर बार
चढ़ती नदी में कूदकर
निकल आती थी साबुत

फूले हैं टेसू
कुहुक-कुहुक उठती है कोयल
लौट आया बसंत
लौटकर नहीं आई वह लड़की । आकाश यादव पत्रकार अशोक नगर

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