जब- जब गरीब का नाम कहीं आएगा,
दास प्रथा से कहां इतिहास बच पाएगा
माना कि आसान नहीं जिंदगी

दास प्रथा उन्मूलन दिवस

जब- जब गरीब का नाम कहीं आएगा,
दास प्रथा से कहां इतिहास बच पाएगा
माना कि आसान नहीं जिंदगी इतनी भी
जब कभी गरीबी की बात होगी कहीं
तब दास प्रथा का नाम याद आएगा।।
बेरहम मालिकों ने इतना तड़पाया
हर दास के लहू से इतिहास रचाया है
चाणक्य ने भी इतिहास में एक दास
को योग्य शासक बनाया है।।

दिसंबर मैं तारिक 2 दास प्रथा
का उन्मूलन दिवस कहलाती है,
बदलते इस जमाने में भी
दास की भूमिका उभर आती है
शायद 2 तारीख को भी इनको
छुट्टी नहीं दी जाती है।।

बदला जमाना,बदले हालात ,बदल रहा हर एहसास
मजबूरी का नाम बना है, इनसे तो है सबको काम
इस बदलती दुनिया में अब नहीं है किसी को आराम
दासी हो या घर का दास अब तो हर कोई इनकी
राह तके दिन रात ,इनके आने से ही तो बनते सारे
घर के बिगड़े काज ।।

प्रतिमा दुबे अभिलाषी
मध्य प्रदेश ग्वालियर

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