हरदोई में बिटिया के गुनहगार को सजा-ए-मौत, रामचरित मानस की चौपाई पढ़कर न्यायाधीश ने सुनाया फैसला, फिर तोड़ दी कलम

सांकेतिक तस्वीर

हरदोई जिले में मासूम बच्ची की दुष्कर्म के बाद हत्या का फैसला अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश चंद्र विजय श्रीनेत ने रामचरित मानस की चौपाई पढ़कर सुनाया। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस में कहा गया है कि… अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।

इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई। न्यायाधीश ने इस अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसका वध करने में कोई पाप नहीं होता।

इसके बाद न्यायाधीश ने गुड्डू उर्फ गब्बू को मौत की सजा सुना दी। सजा सुनाने के बाद न्यायाधीश ने कलम तोड़ दिया और अपने कार्यालय कक्ष में चले गए। फैसला सुनाते समय उन्होंने कहा कि अभियुक्त द्वारा किया गया अपराध न सिर्फ बर्बर, क्रूर व अमानवीय है।

अपितु यह अपराध मानवता की हत्या के बराबर है। उन्होंने कहा कि एक अबोध बालिका जो असहाय और बचावविहीन अवस्था में थी, उसके साथ दुष्कर्म किया और साक्ष्यों को मिटाने के लिए हत्या कर शव को तालाब में फेंक दिया। यह क्रूरता की पराकाष्ठा है। उसने जो कृत्य किया है, ऐसा कृत्य जंगली जानवर और हिंसक जानवर भी अपने या दूसरे जानवरों के बच्चों के साथ नहीं करते।

भारतीय समाज में कन्या को पूज्यनीय माना जाता है। अव्यस्क कन्याओं को विशेषतय: 10 वर्ष तक की कन्याओं को देवी का रूप मानते हुए उनकी पूजा की जाती है और उनके पांव भी धोये जाते हैं। जिस देश में कन्याओं के प्रति इतने उच्च सामाजिक मानक हों, वहां पर डेढ़ साल की अबोध बालिका के साथ इस तरह का कुकृत्य निश्चित रूप से कठोरतम दंड से दंडित किए जाने योग्य है।-चंद्र विजय श्रीनेत, अपर जिला सत्र न्यायाधीश (पाक्सो)

इसलिए तोड़ दी जाती कलम 
फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता रामदेव शुक्ला का कहना है कि अदालती परंपरा चली आ रही है और इसीलिए वह कलम तोड़ दी जाती है, जिससे फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद न्यायाधीश हस्ताक्षर करते हैं। उन्होंने बताया कि यह प्रतीक के रूप में कार्य किया जाता है कि इस कलम के माध्यम से किसी के जीवन के समाप्ति का फैसला हो रहा है तो इस कलम से कोई अन्य कार्य न किया जाए।

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