श्रीधाम गोटेगांव में भागवत कथा के अंतिम दिवस पर पंडित अरविंद तिवारी रीठा वाले के द्वारा सुदामा जी के चरित्र का वर्णन

श्रीधाम गोटेगांव भागवत कथा के अंतिम दिवस पर पंडित अरविंद तिवारी रीठा वाले के द्वारा सुदामा जी के चरित्र का वर्णन किया गया आज भागवत कथा में नरसिंहपुर विधायक श्री जालम सिंह जी पटेल का आगमन हुआ पहुंच करके श्रीमद्भागवत में श्रीधाम सरकार एवं श्री भागवत जी का आशीर्वाद प्राप्त किया पवित्र ब्राह्मण सुदामा श्रीकृष्ण के परम मित्र है सुदामा के घर दरिद्रता का राज्य था उनकी पत्नी का नाम सुशीला था कई बार बालकों को भोजन नहीं मिलता था सुशीला से अपनी संतानों की दुर्दशा नहीं देखी गई वह सुदामा से प्रार्थना कर कहने लगी कि आप कहते हैं कि श्री कृष्ण आपके मित्र हैं तो आप जाकर उनसे द्वारिकापुरी में मिलते क्यों नहीं सुदामा कहते हैं कि वह द्वारिकानाथ है मैं दरिद्र हूं सुशीला उन्हें समझाती है उनकी हजारों आंखें हैं वे देखते ही समझ जाएंगे सुदामा जाने के लिए तैयार तो हो गए किंतु खाली हाथ मित्र के पास कैसे जाते इसलिए सुशीला एक चिथड़े में तंदुल का दाना बांधकर दे दिया और यह कहा कि श्री कृष्ण भगवान को कहना कि भाभी ने यह भेजा है पत्नी के आग्रह और प्रभु के दर्शन की इच्छा से सुदामा द्वारिका की दिशा में चल दिए फटी हुई धोती एक हाथ में लकड़ी और बगल में तंदूल की पोटली थी 7 दिनों की भूखे दुर्बल सुदामा 2 मील चलते ही थक गए रास्ते में दुर्बलता और चिन्ता के कारण उनको मूरछा भी आ जाती थी गरूण जी को भेजकर सुदामा को आकाश मार्ग से द्वारिका नगर तक पहुंचा दिया उन्होंने लोगों से पूछ कर जाना कि वे द्वारिका में आ पहुंचे हैं व सोचा कि द्वारिका वैसे कुछ दूर नहीं है वह जानती नहीं थी कि उन्हें गरुण उठा कर ले आए प्रभु स्मरण करते हुए वे भगवान के द्वार पर आ पहुंचे सुदामा द्वारपाल से कहते हैं कि तुम कृष्ण से जाकर कहो कि उनका मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है जब द्वारपाल अंदर जाकर प्रभु से यह बताता है तो श्री कृष्ण सुदामा शब्द सुनते ही द्वार की ओर दौड़े श्री कृष्ण ने सुदामा को गले लगाया रुकमणी चरण धोने के लिए जल रही थी श्री कृष्ण ने अपने अश्रु जल से सुदामा के चरण धो दिए सुदामा को पलंग पर विठला कर श्री कृष्ण की चरण सेवा करने लगे सुदामा तंदुल की पोटली संकोचवश छिपा रहे थे भगवान ने तंदूल की पोटली छीन ली व उनके द्वारा सारे विश्व में आहार किया अगले दिन अपने गांव को लौटने की तैयारी करने लगे सुदामा अपनी पुरानी धोती पहनकर जाने के लिए तैयार हो गए श्री कृष्ण उन्हें द्वार तक छोड़ने गए सुदामा को गले लगा कर विदा दी सुदामा सुदामा पुरी पहुंचकर अपनी टूटी फूटी झोपड़ी ढूंढने लगे वहां झोपड़ी का तो नामोनिशान नहीं था बड़ा प्रसाद खड़ा था सुदामा सोच रहे थे कि मेरी झोपड़ी को कौन उठा ले गया उधर सुदामा के आगमन का समाचार सुशीला को मिला तो वह दौड़ती हुई बाहर आई और पति का स्वागत करने लगी वह कहती है आपके मित्र

की कृपा से यह सब हुआ है सुदामा का मन कृतज्ञता से भर गया वे प्रार्थना करने लगे मुझे धन की अपेक्षा नहीं है मैं तो यही चाहता हूं कि जन्मांतर मुझे श्री कृष्ण की भक्ति का अवसर मिले उनके चरणों में मुझे स्थान मिलता रहे

दीपक सराठे – संवादाता
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