पृथ्वी दिवस विशेष- प्रकृति को अनर्थ से बचाने का संकल्प है अर्थ-डे

DG NEWS SEHORE

सीहोर से सुरेश मालवीय की रिपोर्ट

सीहोर । सम्पूर्ण विश्व में पृथ्वी ही एकमात्र गृह है जिस पर जीवन जीने के लिए सभी महत्वपूर्ण और आवश्यक परिस्थितियां उपयुक्त अवस्था में पाई जाती हैं। यही कारण है कि पृथ्वी मानवजाति, विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी और विविध प्रकार के सजीवों का भरण-पोषण करने में सक्षम है। हम भी ऐसे सजीव प्राणी हैं जो पृथ्वी के परोपकार पर जीवित हैं। पृथ्वी दिवस एक वार्षिक कार्यक्रम है जो 22 अप्रैल को पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए मनाया जाता है। यह पहली बार 22 अप्रैल 1970 को आयोजित किया गया था और इसमें पूर्व में अर्थ-डे नेटवर्कद्ध द्वारा विश्व स्तर पर समन्वित घटनाओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।आदिकाल से मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना प्रारंभ किया और विकास के पथ पर अग्रसर हुआ। अग्रगामी होती आज की आधुनिकता में मानव ने उपयोग को दोहन में शीघ्रता से परिवर्तित कर दिया है। वर्तमान में युवाओं और आने वाली पीढ़ियों को इन विषयों के प्रति जागरूक होना होगा, क्योंकि हम पर वर्तमान और भविष्य में अत्यधिक प्रभाव पर्यावरणीय समस्याओं से जनित ही होगा। ऐसे कारकों को भी जानना आवश्यक है जो प्रत्यक्ष रूप से हम पर प्रभाव तो डाल रहे हैं किन्तु हम उनके कारणों से हम अनजान हैं। उदहारण के निरंतर बढ़ते हुए तापमान का वायुमंडल में गर्मी का बढ़ना आदि हम रोजमर्रा के जीवन में महसूस कर रहे हैं। इसका कारण है जलवायु परिवर्तन जो कि अब एक वृहद् स्तर की वैश्विक समस्या का रूप धारण कर चुका है। मानवीय क्रियाकलापों से जन्मी यह समस्या कार्बन फुटप्रिंट कम करने, जलाशयों का संरक्षण कर जल की आपूर्ति करने, अपशिष्ट और प्लास्टिक को न जलाने, वृक्षारोपण करने और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि करने से संतुलित हो सकती है। हमारी पृथ्वी के पास सीमित मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता है। प्राकृतिक भंडारों से हम यदि सिर्फ दोहन और उपयोग ही करते रहे तो हमें हर्जाने के रूप में प्रकृति का प्रकोप झेलना होगा। हमारे द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग का लेखा-जोखा हमें अर्थ ओवरशूट डे बताता है। अर्थ ओवरशूट डे अर्थात् साल का वह दिन जब हम धरती द्वारा पूरे साल के लिए उपलब्ध कराए गए समस्त संसाधनों का उपभोग कर चुके होते हैं। साल भर के लिए उपलब्ध कराए गए संसाधन से मतलब संसाधनों की उस मात्रा से होता है जिसका पृथ्वी एक साल में पुनर्सृजन कर सकती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो साल के जिस दिन यह दिवस मनाया जाता हैए उस दिन के बाद से वर्ष भर मानव जितने भी ईंधन, पेयजल, कपड़ा, अनाज, मांस-मछली-अंडा आदि का उपभोग करेगाए उन्हें अपनी सहज गति में उपजाने की क्षमता पृथ्वी में नहीं है। कोरोना महामारी के कारण विश्व आज इस स्थिति में नहीं है कि वृहद् स्तर पर सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों का संचालन कर सकें या सार्वजनिक स्थानों पर पेड़ लगा सकें। किन्तु अपने घरों में सुरक्षित रहकर सिंगल यूज प्लास्टिक के त्याग, जल संरक्षण, पर्यावरण की सुरक्षा और पक्षियों के लिए दाना-पानी उपलब्ध कराने के प्रयास से संकल्पित तो हो ही सकते हैं। इस प्रकार के प्रयासों से हम अपने भविष्य की नींव मजबूत करने की दिशा में कदम बड़ा सकते हैं ताकि भविष्य में कोरोना के बाद कोई ऐसी महामारी न आए, जिससे मानवजाति का अस्तित्व संकट से घिर जाए।

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