झाबुआ में कमीशन का खेल….. City scan मे डॉक्टरो का निजी आर्थिक स्वार्थ

झाबुआ। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल, लखनऊ के केजीएमयू और अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने मिलकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बदौलत एक प्रोग्राम तैयार किया है, जिससे सिर्फ सीने यानी छाती का एक्स-रे (X-Ray ) देखकर यह पता चल पाएगा कि मरीज कोरोना संक्रमित है या नहीं।
जिला मुख्यालय सहित तहसील लेवल पर संचालित शासकीय एवं निजी अस्पतालों,क्लीनिक में डॉक्टरों की ऊपरी कमाई का जरिया बन चुका है कोरोना वायरस जो उपचार के लिए पहुंच रहे हैं मरीजों की जांच कर तुरंत सिटी स्कैन के लिए आजाद सिटी स्कैन सेंटर झाबुआ भेज रहे हैं, इसके पीछे का सच यह है कि रेफर मरीज के सिटी स्कैन में स्वास्थ्य कर्मियों का कमीशन जुड़ा हुआ है जो जितने पेशेंट सिटी स्कैन सेंटर पर भेजेंगे प्रति मरीज के हिसाब से कमीशन तय कर रखा है अब यह देखने को मिल रहा है कि गरीब मजदूर स्वास्थ्य उपचार के लिए अस्पताल पहुंचता है तो उसे 2500 से ₹3000 का सिटी स्कैन करवा कर लाने को कहा जा रहा है जबकि चेस्ट एक्स-रे से भी मरीज को कोरोना संक्रमित है या नही मरीज का पता किया जा सकता है लेकिन मरीज को सिटी स्कैन करवाने की बात कह कर डर का माहौल उत्पन्न किया जा रहा है, गरीब मजदूरी कर परिवार चलाने वाला मरिज सिटी स्कैन, लैब जांच और दवाइयां लेने तक 4 से ₹5000 रुपए खर्च के बतौर आ रहे हैं, जो अपनी आर्थिक स्थिति से पहले से परेशान है और ऐसे में कमीशन के खेल के चक्रव्यूह में फसकर कोरोना के डर से मरीज तबीयत खराब कर रहा है। शासन के नियमानुसार रैपिड टेस्ट आरटीपीसी टेस्ट और एक्स-रे से पता चल सकता है कि कोरोना है या नहीं,अगर इंफेक्शन के बात है तो यह भी x-ray से पता चल सकता है।पूर्व में भी एक्स-रे के माध्यम से ही कोरेना मरीजों को इंफेक्शन होने की पहचान की गई थी तो इस बार सिटी स्कैन अनिवार्य क्यों हो गया।

Leave a Reply