महीने में कितने दिन आपको पीरियड्स के दर्द की वजह से ऑफिस से छुट्टी करनी पड़ती है?

बोलूं या न बोलूं। महिलाएं इस संकोच में चुप रह गईं कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन दीपिंदर गोयल ने परवाह किए बिना पूछ डाला, ‘महीने में कितने दिन आपको पीरियड्स के दर्द की वजह से ऑफिस से छुट्टी करनी पड़ती है?’

देश के बड़े फूड डिलिवरी ऐप ज़ोमैटो के फाउंडर और चीफ एग्ज़िक्यूटिव ऑफिसर गोयल ने यह सवाल अपने चार हज़ार कर्मचारियों के सामने रखा। फिर बेबाकी से कंपनी में काम कर रहीं महिलाओं और ट्रांसजेंडर को साल में 10 छुट्टी देने का ऐलान कर दिया। ज़ोमैटो का यह फैसला तुरंत चर्चा का विषय बन गया और लौट आई वर्षों से चल रही बहस। पीरियड के लिए अलग से छुट्टी देना कितना जायज़ है?

इसका विरोध करने वालों में सबसे आगे नाम आता है जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त का। उनका मानना है कि इस तरह की पॉलिसी महिलाओं के साथ भेदभाव का ज़रिया बनेगी। उन्होंने ट्वीट किया, ‘इससे महिलाओं की सेना में भर्ती होने, फाइटर जेट उड़ाने, वॉर रिपोर्टिंग करने, स्पेस में जाने जैसी इच्छाएं और बड़ी ज़िम्मेदारियों के मौके मारे जाएंगे।’ इससे पहले 2017 में भी उन्होंने पीरियड लीव के ख़िलाफ कई ट्वीट्स के ज़रिए पक्ष रखा था। तब और आज, उनके ट्वीट्स पर जमकर कमेंटबाजी हुई है।

बरखा के हालिया ट्वीट का कई महिलाओं-पुरुषों ने समर्थन किया, तो बढ़-चढ़कर विरोध भी हुआ। महिलाओं के हक़ में आवाज़ उठाने वाली एक्टिविस्ट रितुपर्णा चटर्जी ने लिखा, ‘पीरियड का अनुभव सबके लिए एक-सा नहीं होता। जो वर्षों से इसके भयंकर दर्द से गुज़र रही हैं, उनका उसपर बस नहीं। उन्हें लीव का अधिकार मिलना चाहिए। छुट्टी करें या न करें, यह उनका फैसला है।’

हर महीने होने वाले पीरियड महिलाओं के लिए कई तरह की परेशानियां साथ लेकर आते हैं। कइयों के लिए इसका दर्द असहनीय होता है। पेट में एक अजीब ऐंठन। कमर जाम हो जाना। पैरों में फटन। कमज़ोरी और कभी-कभी तो उल्टी-बेहोशी तक नौबत पहुंच जाती है।

हमारे समाज में इसपर खुलकर बात नहीं होती, क्योंकि इसे टैबू की तरह देखा गया है। हालत बयां करने का रास्ता नहीं दिखने और चुपचाप बैठकर पीड़ा सहन करने के चक्कर में कई बार महिलाओं की तबीयत काफी बिगड़ जाती है।

आर्किटेक्ट फर्म के साथ काम कर रहीं 25 वर्षीय निहारिका गुप्ता बताती हैं, ‘मेरी एक दोस्त को पीरियड्स में हद से ज़्यादा दर्द होता है। छुट्टी कैसे मांगूं के संकोच में वह ऑफिस चली आती है, लेकिन काम करना लगभग नामुमकिन होता है। इससे काम का प्रेशर महसूस होता है और वह बुरा फील करती है। कई बार हालत यूं हो गई कि अंत में उसे घर छोड़कर आना पड़ा।’

जिन महिलाओं को अमेनेरिया, प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम, पीसीओडी जैसी पीरियड-संबंधी बीमारियां होती हैं, उनके लिए महीने के पांच दिन बाकियों से कहीं तकलीफ भरे होते हैं। इन परेशानियों में महिलाओं को आराम करने की छूट देने का समर्थन बॉलिवुड अभिनेत्री ट्विंकल खन्ना भी करती हैं। हालिया विवाद के बीच उन्होंने इंस्टाग्राम पर पोस्ट डाला कि महिलाएं पुरुषों के बराबर हैं, यह साबित करने के कई तरीके हैं। इसके लिए तकलीफ में आराम करने का हक़ छीनना सही नहीं। महिलाएं और पुरुष ‘बराबर हैं पर हूबहू एक जैसे नहीं’।

रितुपर्णा और ट्विंकल के ख़यालात से निहारिका जैसी कई युवा महिलाएं ताल्लुक रखती हैं। दिल्ली में नौकरी करने वाली 25 वर्षीय मीनल गुप्ता बताती हैं, ‘शुरू के दो दिन मेरे लिए बेहद मुश्किल भरे होते हैं। मैं ऑफिस तो जाती हूं, लेकिन पूरी कोशिश रहती है कि लंबी मीटिंग में बैठने या बाहर जाकर भागदौड़ करने वाले असाइनमेंट से बचूं। लेकिन ऑफिस शेड्यूल मेरे हाथ में नहीं। ऐसे मौकों पर पीरियड लीव मददगार साबित हो सकती है। विकल्प नहीं होने के कारण दर्द झेलना पड़ जाता है।’

दर्द बर्दाश्त करने की मजबूरी पर निहारिका कहती हैं कि पीरियड हर महीने होने वाला प्रोसेस है। इसके लिए हर 28वें दिन शर्मिंदगी महसूस करना कहां तक सही है? इसके जवाब में उनकी बहन और बेंगलुरु में नौकरी कर रहीं विदुषी गुप्ता का कहना है कि हमें अपनी बात रखनी होगी। मैं बॉस को बताती हूं कि मुझे तकलीफ़ हो रही है और डेस्क के पास मैट बिछाकर कुछ देर आराम करती हूं। पहले मुझे अजीब लगता था, पर अब मैं और टीममेट इसे लेकर नॉर्मल हो गए हैं।

विदुषी की तरह पीरियड को आम विषय बनाने में विश्वास रखने वाली 28 वर्षीय नेहा सहाय का कहना है, ‘जिन्हें परेशानी होती है, वे खुलकर छुट्टी मांग सकें तो ऑफिस कल्चर में पीरियड एक नॉर्मल टर्म बनेगा। इसे इतनी बड़ी बात माना जाता है कि फीमेल कलीग बॉस को बताने के बजाय दर्द बर्दाश्त करना बेहतर समझती हैं।’

वह चाहती हैं कि यह उतनी ही आम बात बने जैसे हफ्ते में छह दिन और प्रति दिन आठ घंटे काम करना। यह आज का ‘नॉर्मल ऑफिस कल्चर’ है। इंडस्ट्रियल रेवॉल्यूशन के दौरान फैक्टरियों और ऑफिस में हफ्तेभर 62 घंटे काम होता था। वर्कर्स ने जब इसमें राहत की मांग की तो काम पर असर पड़ने, प्रॉडक्टिविटी घटने जैसे कई तर्क दिए गए थे। अमेरिका में कई दशक चले संघर्ष का नतीजा है, जो आज घड़ी में छह-सात बजते ही कइयों के पास बैग उठाकर घर निकल जाने की आज़ादी है।

महिलाएं मासिक परेशानी में कंपनियों से ऐसी ही आज़ादी की मांग कर रही हैं। ज़ोमैटो ने इसे सुना और आगे बढ़ाने का प्रयास किया। पीरियड लीव इसकी पहली सीढ़ी है। विदुषी कहती हैं, ‘अच्छी कंपनी कर्मचारियों की परेशानियां समझती है। छुट्टी इसका शुरुआती पहलू है। आगे चलकर ऑफिस में ऐसी सुविधाएं दी जा सकती हैं, जिससे महिलाएं कंफर्टेबल महसूस करें। कुछ देर अलग रूम में जाकर आराम करने की सुविधा या उन दिनों डेडलाइन का प्रेशर नहीं बनाना। ऐसे कुछ छोटे-छोटे कदम माहौल विमेन-फ्रेंडली बनाएंगे।’

पीरियड को लेकर अच्छा माहौल बनाने की ज़ोमैटो से पहले भी कोशिशें की जा चुकी हैं। बिहार में सरकारी महिला कर्मचारियों को 1992 से महीने में दो अतिरिक्त कैजुअल लीव मिल रही हैं। 2017 में डिजिटल मीडिया कंपनी कल्चर मशीन ने पीरियड लीव पॉलिसी लागू की थी। ज़ोमैटो के दीपिंदर गोयल के मुताबिक, कोशिशें जारी हैं ताकि पीरियड का हौआ ख़त्म किया जा सके। इसमें कितना समय लगेगा, वह हम-आप पर निर्भर करता है।

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