शिवराज के जन्मदिन पर विशेष एक नतमस्तक राजनेता शिवराज सिंह चौहान

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कल 5 मार्च को 63 साल के हो जाएंगे यानी उनका 64 वा जन्मदिन के मौके पर अक्सर व्यक्ति के कसीदे काढ़े जाते हैं ,हर कोई ठकुरसुहाती में जुट जाता है लेकिन ये दिन असल में व्यक्ति के मूल्यांकन का दिन भी होता है और इस दिन का इसी तरह से इस्तेमाल किया जाना चाहिए .
मध्य्प्रदेश की राजनीति में शिवराज सिंह पहले और शायद आखरी नेता होंगे जो काठ की हांडी साबित नहीं हुए. शिवराज सिंह काठ की हांडी से बेहतर साबित हुए और उनकी पार्टी भाजपा ने उन्हें लगातार 32 साल से बार-बार इस्तेमाल किया .ये शिवराज सिंह की दक्षता रही की उन्होंने हर भूमिका में अपने आपको कामयाब साबित किया सिवाय 2018 के विधानसभा चुनाव के .2018 के विधानसभा चुनाव की पराजय के बाद भी शिवराज अपनी पार्टी के भरोसेमंद नेता बने हुए हैं .
शिवराज सिंह को याद करने के अनेक कारण हैं .इनमें से एक सबसे बड़ा कारण है उनका पूरे राजनीतिक जीवन में देश के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश का 13 वर्ष से अधिक मुख्यमंत्री रहना .राजनीति के बड़े-बड़े चाणक्यों के कहते में ये कीर्तिमान दर्ज नहीं है.इस कीर्तिमान के पीछे शिवराज सिंह चौहान की अपनी कार्यशैली के साथ ही उनका नसीब भी बराबर का भागीदार है .उनकी किस्मत थी की वे राजनीति में सीधे लोकसभा चुनाव जीतकर आये .लगातार चार बार सांसद रहे शिवराज सिंह चौहान को पार्टी ने जब भाजयुमो का अध्यक्ष बनाया था तब लगता नहीं था की वे एक कामयाब युवा नेता साबित होंगे लेकिन उनकी हांडी में शायद काठ था ही नहीं ीालिये वे इस अग्नि परीक्षा में भी कामयाब हुए.
मुझे याद है की उनके नसीब ने उन्हें 2005 में कैसे अचानक प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था. मध्यप्रदेश को कांग्रेस से छीना था उमा भारती ने लेकिन वे कुछ कहने बाद ही राज कर पायीं.उनकी जगह आये बाबूलाल गौर को उमा पचा नहीं पायीं और ऐसे में विकल्प के तौर पर शिवराज सिंह चौहान को लाया गया .तब कोई नहीं जानता था की शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘अंगद का पैर’ साबित होंगे,जिसे हिला पाना कांग्रेस के लिए तो दूर उनकी अपनी पार्टी के दुसरे नेताओं के लिए भी असम्भव होगा .शिवराज एक बार नसीब से दो बार अपने पुरषार्थ से और चौथी बार भी नसीब से मुख्यमंत्री बने .ये कीर्तिमान ही शिवराज सिंह चौहान को अपनी पार्टी के तमाम नेताओं से अलग बनाता है .
मुझे लगता है कि शिवराज का नसीब आगे भी उनका साथ देने वाला है. वे भले ही पांचवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें या न बनें किन्तु वे हमेशा पार्टी की राजनीति में प्रासंगिक रहेंगे .मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान की पारी बहुत यादगार दिखाई नहीं देती. इस बार वे महाराज की बैशाखियों के सहारे मुख्यमंत्री हैं और बैशाखियों के सहारे कोई नेता अपनी साख न बना सकता है और न कायम रख सकता है .बीते दो साल में मुख्यमंत्री रहते हुए वे न पहले की तरह लोक-लुभवन तरीके से फैसले कर पा रहे हैं और न खुलकर खेल पा रहे हैं. उनके तमाम महत्वपूर्ण फैसलों पर एक दबाब दिखाई देता है .
शिवराज सिंह चौहान की उपलब्धियां गिनाने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि वे सबके सामने हैं. उनकी विफलताएं भी किसी से छिपी नहीं हैं. लेकिन वे तमाम विसंगतियों के बावजूद अपनी भूमिका के साथ न्याय करने की कोशिश कर रहे हैं .वे अब न 2005 के शिवराज हैं और न 2008 के शिवराज .वे 2013 के शिवराज भी नहीं हैं. वे 2022 में एक अलग किस्म के शिवराज हैं ,ऐसे शिवराज जिन्हें हर कोई अपने दबाब में लेना चाहता है. फिर चाहे वे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय या और कोई तीसरा -चौथा नेता .नौकरशाही का भी अब शिवराज से मोहभंग हो चुका है .बावजूद शिवराज आज भी शिवराज बने हुए हैं .
मुमकिन है कि मेरा आकलन गलत हो क्योंकि मई न तो प्रदेश के मामा मीडिया में उठता-बैठता हूँ और न कभी निजी रूप से शिवराज सिंह चौहान के समपर्क में रहा हूँ ,लेकिन लगता है की अब 2024 में शिवराज का मुख्यमंत्री पद पर लौटना आसान नहीं होगा .उनके लिए पार्टी कोई नयी भूमिका आरक्षित करेगी .वे न तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह पार्टी के लिए चुनौती हैं और न किसी के प्रतिद्वंदी . वे एक ‘नतमस्तक’ नेता हैं जो किसी के साथ भी काम कर सकते हैं. 2014 में जब भाजपा में नरेंद्र मोदी का पदार्पण केंद्रीय राजनीति में हुया था उस समय शिवराज सिंह की निष्ठाएं तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व के प्रति थीं किन्तु उन्होंने बड़ी ही सावधानी से नए नेतृत्व के सामने अपने आपको ‘नतमस्तक’ मुद्रा में प्रस्तुत किया और बिना किसी नुकसान के काम करते रहे .
व्यक्तिगत रूप से शिवराज सिंह एक भले और सहज नेता के रूप में जाने जाते हैं ,यही उनकी विशेषता है. इसी सहजता के आवरण में रहकर उन्होंने अपने आपको तमाम आंधी-तूफानों से बचाकर रखा हुआ है. अब उनके सामने दो ही चुनौतियाँ हैं. पहली अपने लिए नयी भूमिका के हिसाब से तैयार करना और दूसरी अपने बच्चों को अपने राजनितिक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करना .उनके पास हर तरह का धन है ,संतोष का धन भी है. गौधन,गजधन और बाजधन भी इफरात में हैं ,हालाँकि इसके लिए उन्होंने इसके लिए योजना बनाकर कभी कोई काम नहीं किया.सब अपने आप होता गया .शिवराज सिंह चौहान भविष्य में भी यशस्वी बने रहें ,उनके नाम के साथ नए-नए कीर्तिमान जुड़ते रहें ऐसी कामना करने में मुझे कोई गुरेज नहीं है .सियासत की आग पर उनकी हांडी की पैंदी कभी न जले यही कामना है.

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