बंगला बगीचा के रहवासियों का फुटा आक्रोश लिया निर्णय
संशोधन नहीं तो वोट नहीं
यही है असली जननायक

निप्र नीमच करण नीमा बाबा
एक जनहित समस्या बंगला बगीचा जो लंबे समय से चली आ रही है जिस पर आज तक सिर्फ राजनीति होती हुई आई है लेकिन किसी भी पार्टी सरकार के जनप्रतिनिधियों में इतनी काबिलियत नहीं है की जन समस्या का समाधान कर सके
जो जनता के सेवक बने फिर रहे हैं
पर असल में वह नौकर रखने लायक भी नहीं है
ऐसी स्थितियों में जनहित की लड़ाई को लड़ने के लिए और समस्या के संशोधन के लिए जिसने यह बीड़ा उठाया है और जिसने इस जंग की शुरुआत पुरे दम खम के साथ की है वह भी एक बीजेपी समर्थक एडवोकेट अमित शर्मा हे
जो नीमच जिले में जन नायक के रूप में उभर कर सामने आए हे
उन्होंने बताया है की जिस मुद्दे को आज विपक्ष को उठाना चाहिए बड़ी शर्म की बात है की मेरे द्वारा इसकी शुरुआत हुई है सोशल मीडिया से लेकर अखबार की सुर्खियों तक और आवेदनों से लेकर आंदोलन में आज जो इनके साथ सैकड़ों की तादाद में आमजन जुड़े हैं इससे यह मुद्दा शहर में चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि यह समस्या किसी एक की व्यक्तिगत नहीं है और नाही किसी एक पार्टी के व्यक्ति विशेष की है
इस आंदोलन को समर्थन देने वाले ऐसे व्यक्ति भी है जोकि भाजपा समर्थक है
आखिर ऐसा क्यों इससे साफ जाहिर होता है कि भाजपा पार्टी में भाजपा की गलतियों पर चुप्पी साधे बैठे रहे ऐसे व्यक्ति नही हे
वह उन व्यक्तियों को भी बेनकाब कर सकते हैं जो पार्टी के बैनर तले विभागों से सांठगांठ कर पार्टी को बदनाम करने पर आमद है
जिन्होंने अपना स्वाभिमान तक बेच दिया है
मेरा इनसे यह कहना है अगर पार्टी में हो तो पार्टी के ही वन के रहो पार्टी के माई बाप बनने की कोशिश ना करें और अपने कार्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए अपने पद का निर्वहन करें
क्योंकि यह जनता है जिन्होंने अपना अमूल्य मत देकर आपसे पूर्ण विश्वास की उम्मीद कर आप को चुना है
अब बात कसौटी पर खरे उतरने की है
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है देश का शासन प्रशासन को चलाता है ना कि प्रशासन शासन को
इसलिए प्रशासन से जुड़ने सांठगांठ रखने की बजाए आम जनता से जुड़े उनकी हर समस्या में उनके साथ खड़े रहे उनकी दुख तकलीफ को अपनी समझे क्योंकि आपको फिर आने वाले समय में इन्हीं के पास हाथ जोड़ने और झोली फैलाने जाना है
क्यों की आज बंगला बगीचा संघर्ष समिति मैं पार्टी समर्पित लोगो का होना आपके लिए बड़े शर्म की बात हे
और सही भी है क्योंकि इतिहास गलत का विरोध करने वालों का लिखा जाता है तलवे चाटने वालों का नहीं
अगर निर्धारित समय में संबंधित व्यक्तियों ने इस आंदोलन की गूंज नहीं सुनी हो और अपनी आंखों पर से लगा चश्मा नहीं उतारा हो तो वह अपने कानों के डूचो को बाहर कर ले और आंखों पर लगा चश्मा उतार ले और इस समस्या का निराकरण कर दे
कहीं ऐसा ना हो कि आंदोलनकारियों का विराट रूप देखने को मिले और यह आंदोलनकारी निवेदन आवेदन आंदोलन से दनादन तक पहुंच जाए

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