व्यवस्था बडी या नेतागीरी?????

सवाल बड़ा है ,लेकिन छोटे स्तर से उठाया जा रहा है.संयोग से ऐसे बड़े सवाल छोटे स्तर से ही किये जाने चाहिए किन्तु स्थानीय स्तर की विवशताएँ ऐसे सवाल करने की इजाजत नहीं देतीं और इसका खमियाजा पूरे समाज को,फिर शहर को ,फिर सूबे को अंत में देश को भुगतना पड़ता है.देश ऐसे अनेक खमियाजे भुगत भी रहा है .
बात पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी के गृहनगर ग्वालियर की है.सवाल भी उनके अपने भांजे [जो की पूर्व सांसद,और मंत्री भी हैं ] अनूप मिश्रा के कारण उठे हैं. मिश्रा जी ने अपनी राजनीति चमकने के लिए कोरोनाकाल में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए ग्वालियर की पुरानी सब्जी मंडी में ही कारोबार शुरू कारा दिया,जबकि जिला प्रशासन इसके लिए मना कर चुका था .पुरानी मंडी में सुब-सुबह कोई दस हजार लोग कारोबार के लिए एकत्र हो गए .
मिश्रा जी भाजपा के शीर्ष नेताओं में से एक हैं.दाबांग हैं,जनता से जुड़े हैं किन्तु पार्टी आजकल उन्हें भाव नहीं दे रही इसलिए मिश्रा जी अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ अपने स्तर पर मोर्चे खोलकर खड़े हो जाते हैं .मिश्रा जी की अपनी राजनितिक विवशताएँ हैं लेकिन जिले का प्रशासन मिश्रा जी के सामने विवश क्यों है ,अब तक समझ नहीं आया. मिश्रा जी की कृपा पाकर लोग क़ानून की धज्जियां उड़ाते रहे और जिला प्रशासन हाथ पर हाथ रखे अपने दफ्तरों में बैठा रहा.आखिर कौन मिश्रा जी से पंगा ले ?
आपको याद होगा कि मैंने पिछले दिनों मिश्रा जी द्वारा हाट बाजारों की अनदेखी कर सड़कों और फुटपाथों पर कारोबार करने वालों की हिमायत में भूख हड़ताल करने वाले इन्हीं मिश्रा जी को आड़े हाथों लिया था .उस समय भी जिला प्रशासन ने मिश्रा जी के सामने घुटने टेके थे ,और आज भी टेके .प्रशासन के घुटने हैं,वो अपने घुटने जहाँ चाहे तक सकता है,घुटनों के बल खड़ा हो सकता है लेकिन हम जैसे मुंहफट लोग अपनी बात कहने से पीछे नहीं हटते .
हमारे देश में ये समस्या केवल श्री अटल बिहारी बाजपेयी के नगर या उनके भाजे की नहीं है बल्कि पूरे देश की है. हमारे यहां नेतागीरी के सामने प्रशासन हो या सरकार अपवादों को छोड़कर जब देखिये तब घुटने टेक कर बैठ जाती है. घुटने टेकना हमारी व्यवस्था का स्थायी भाव है. किसान आंदोलन के सामने देश की सरकार ने अबतक घुटने क्यों नहीं टेके ये अपवाद जरूर है .सवाल ये है की कोरोनाकाल में व्यवस्थाएं प्रशासन के नजरिये से चलेंगी या नेताओं के नजरिये से ?नेताओं और प्रशासन के नजरिये में भारी अंतर् होता है .
मुझे दुःख होता है कि हमारे यहां कुछ भी नियमानुसार नहीं चलता,उसे चलने के लिए नेतागीरी की जरूरत हर जगह और हर समय है ,नेतागिरी हमारा राष्ट्रीय चरित्र है. हम यदि विपक्ष में हैं तो नेतागिरी करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और यदि नेता जी इस जन्मसिद्ध अधिकार का इस्तेमाल करते हैं तो मैदान छोड़ जाना हमारे प्रशासन का जन्मसिद्ध अधिकार है .हम रणछोड़ों के सहारे देश चलने का प्रयास कर रहे हैं .फलस्वरूप हमारे यहां प्रबंधन और योजना के काम को कहीं दीमक लगी है और कहीं घुन .अर्थात सब कुछ खतरे में हैं .
इस सवाल का जबाब सरकार के कामकाज में ही निहित है .सरकार ने प्रशासन का इकबाल बुलंद होने ही नहीं दिया है.सरकार प्रशासन के इकबाल को नेताओं के बूटों तले रोज रुंदवाती है .हर जगह प्रशासन हारता है और नेतागीरी जीतती है .ग्वालियर से लेकर दिल्ली तक यही हाल है .यानि हमारे देश में राजनीति सर्वोपरि है .सब कुछ राजनीति के अधीन है जीवन का कोई एक ऐसा पहलू नहीं है जो कि राजनीतिक हस्तक्षेप से अछूता हो.आप जानते हैं की राजनीति जिस किसी भी विषय या क्षेत्र को छू लेती है तो उसका बंटाधार ही होता है .
दुइया के अनेक देशों में अनेक राजनीतिक प्रणालियाँ हैं किन्तु केवल उन देशों की जनता सुखी है जहाँ रोजमर्रा के काम में राजनीति का कोई दखल नहीं है.राजनीति विकास की सबसे बड़ी दुश्मन है,दुर्भाग्य ये है कि हमारे यहां राजनीति बिना सब सून है .क्या आपको नहीं लगता की हमारे यहां भी परिदृश्य बदलने के लिए अब राजनीति को सीमिति किया जाना चाहिए .राजनीति की बैशाखियाँ हटाए बिना हम तरक्की कर ही नहीं सकते .राजनीति की बैशाखियाँ केवल उसी सूरत में हटाई जा सकती हैं जब हमारा प्रशासन उत्तरदायी बने और राजनेताओं के सामने तनकर खड़े होने वाला प्रशासन ही व्यवस्था को नई ऊर्जा दे सकता है .राजनीति के लिए हर गलत -सही काम के लिए सरकार को घेरने वाले मिश्रा ब्रांड नेता अपनी आदतों से बाज आएं .क्या किसी में है इतना नैतिक बल ?
दुर्भाग्य ये है की श्री अनोपप मिश्रा लगातार अपनी ही सरकार के खिलाफ आक्रामक होते जा रहे हैं किन्तु प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार मिश्रा जी की अनदेखी कर रही है. जिला प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई कार नहीं सकता और पार्टी स्तर पार भी किसी का साहस नहीं हो रहा की वो मिश्रा जी कोई हटक सके .मिश्रा जी राजनीति में भर्राशाही का एक प्रतीक भर हैं.वे हमारे मित्र हैं शत्रु नहीं.हम एक प्रवृत्ति के खिलाफ खड़े होना चाहता हैं

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