मेरे मन ने आज सोचा आइये जेरा हंस ले

पिछले एक साल से मरने की तैयारी कर रहे राम बिहारी ने एक बार फिर से मरना स्थगित कर दिया है .दुइया की सारी जिम्मेदारियों से फारिग हो चुके राम बिहारी के पास केवल और केवल मरने का काम बाक़ी रह गया है ,लेकिन वे आसानी से मर भी नहीं पा रहे हैं .ताजा अखबार पढ़कर उन्होंने अगले एक साल के लिए अपना मरना मुल्तबी कर दिया .
राम बिहारी हर काम पूरी निष्ठा से करते हैं.वे जिए तो पूरी निष्ठा के साथ किये और जब उन्होंने मरने का निश्चय किया तो हालात बदल गए .राम बिहारी मानते हैं की जीवन की तरह ही मृत्यु भी एक संस्कार है ,उसे धूम-धाम से पूरा किया जाना चाहिए .राम बिहारी के इस विचार से उनके परिज और मित्र इत्तफाक नहीं रखते लेकिन राम बिहारी को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता .वे चाहते हैं की उनकी मौत पूरी धूम-धाम के साथ हो .
धूमधाम में विश्वास करने वाले राम बिहारी ने कोरोना का टीका लगवाया तो पूरी धूमधाम का इंतजाम किया था ,आखिर माननीय प्रधानमंत्री जी का कहा वे कैसे टाल सकते थे ? प्रधानमंत्री जी ने कहा था की टीकरण उत्सव की तरह होना चाहिए ,सो राम बिहारी ने किया .पार्टी टाइम जाकर कागज की ध्वजाएं,तोरण और फुग्गे लेकर आये वे .आतिशबाजी का इंतजाम किया लेकिन टीका नहीं मिला मौके पर ,राम बिहारी का मूड आग हो गया .उन्होंने टीका न मिलने पर अपने माथे पर काला टीका लगा लिया लेकिन उत्सव मनाया .
राम बिहारी मानते हैं की आप टीके का चाहे एक डोज लीजिये या दो -तीन ,होना कुछ नहीं है. यदि जाने का परवाना आ गए होगा तो जाना ही पड़ता है और जाना भी चाहिए .यमदूतों के सरकारी कामकाज में बाधा डालने का कोई हक किसी को नहीं है.खैर इधर राम बिहारी मरने का पूर्वाभ्यास कर रहे थे ,उधर अखबार में खबर छप गयी कि जिन भस्मकों में शवदाह का इंतजाम है उनकी चिमनियां गरमी के मारे पिघल रहीं हैं .लाशों का ढेर लग रहे हैं .खबर पढ़कर राम बिहारी का दिल पिघलने लगा ,बोले फिलहाल मरना स्थगित .फिर कभी मरकर देख लेंगे.जब तक देश में सबको साथ लेकर सबका विकास करने का संकल्प रखने वाली सरकार केंद्र में है तब तक निराश होने का नहीं है.
कोरोना के कारण धड़ाधड़ मर रहे लोगों को लेकर चिंतित राम बिहारी कहने लगे हाथ कंगन को आरसी क्या,पढ़े-लिखे को फारसी क्या ?वे सबको समझाते हैं कि मरने से मत डरो.डरावनी तो जिंदगी हो गयी है. अर्थात पहले नहीं थी लेकिन अब कर दी गयी है .हर चीज मंहगी है और हाथ न मुठ्ठी खुरखुरा उठी.मंहगाई इतनी है कि कमर टूटी जा रही है और फ्रिज इतना छोटा है कि उसमें ज्यादा कुछ ठूंसा नहीं जा सकता .जीने के लिए कम से कम एक सप्ताह का इंतजाम तो घर में होना ही चाहिये,क्या पता ,कब लाकडाउन लग जाये ?
रामबिहारी खुश होकर फन्ने मियाँ को बता रहे थे कि अब मरने की कोई ख़ास जल्दी नहीं है,क्योंकि अब देसी टीकों के साथ रूसी और अमरीकी टीके भी बाजार में आने का रास्ता साफ़ हो गया है, सरकार सब कुछ साफ़ करने रखना चाहती है,अपनी छवि भी .इस कोरोना ने सरकार की छवि को बहुत नुक्सान पहुंचाया है एक तरह से सरकार को बेपर्दा कर दिया है .हम चूंकि राम बिहारी के मुरीद हैं इसलिए बताये दे रहे हाँ कि जहाँ-जहाँ जो चाहे सो मांगा कर रख लीजिये,क्या पता अबकी बार मिले और अगली बार न मिले.कोरोनाकाल में राम बिहारी जैसे बहुत कम लोग रह गए हैं. बाक़ी सब तो बस यूं ही है क्या ?
कभी न मुस्कराने वाले राम बिहारी अपने मरने की तैयारियों को लेकर हमेशा प्रफुल्लित दिखाई दे रहे थे.दुनिया राम बिहारी पर मरती है और राम बिहारी कोरोना पर मरते हैं और कोरोना राम बिहारी पर .बिहारी दरियादिल होता है ,हर धोखा हंसकर खा लेते हैं .राम बिहारी का कहना है कि -;जब वे दिन नहीं रहे तो ये भी दिन नहीं रहेंगे. सो खुलकर जियो लेकिन एहतियात से .जिओ .

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