पहली बार ऑक्सीजन का सीजन

नासिक में जिस प्राणवायु ने 22 लोगों की जान ले ली उसी प्राणवायु ऑक्सीजन के लिए जनता मारी-मारी फिर रही है और सरकार आलोचना का शिकार बनीं हुई है ।ऑक्सीजन के बारे में हमने माध्यमिक कक्षाओं में पहली बार पढ़ा था .पहली बार पढ़ा था कि कैसे आक्सीजन और हाइड्रोजन के जोड़ से पानी बनता है. हमने कभी नहीं पढ़ा था कि दुनिया में आक्सीजन का भी कोई सीजन होता है या कभी ऐसे हालात भी बन सकते हैं जब ऑक्सीजन के बिना साधारण ही नहीं बल्कि ख़ास आदमी भी बेमौत मारे जा सकते हैं .देश-दुनिया में कोरोना की दूसरी लहर ने प्रमाणित कर दिया कि आक्सीजन का न सिर्फ सीजन होता है बल्कि इस सीजन में आक्सीजन खोजने पर भी नहीं मिलती ,ऐसे में लोगों की साँसे उखड़ना स्वाभाविक है.
कोरोना के संक्रमण में ऑक्सीजन की मांग सबसे ज्यादा बढ़ी है. इस विषाणु ने मनुष्य के श्वसन तंत्र पर ऐसा हमला बोला है कि जान बचना मुश्किल हो रहा है .पहली बार ऑक्सीजन की मांग इतनी बढ़ी है कि सरकार के हाथ-पांव फूल गए हैं. तमाम औद्योगिक संगठनों द्वारा ऑक्सीजन का दान किये जाने के बावजूद स्थिति बेकाबू हो रही है.अभी तक आक्सीजन का सबसे बड़ा स्रोत तो प्रकृति को ही माना और समझा जाता था,लेकिन दौरे हाजिर ने ये बात साबित कर दी है कि आक्सीजन की आपूर्ति अब प्रकृति के हाथ में नहीं रही है .
आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रतिदिन ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता 7127 मीट्रिक टन है.बीते 12 अप्रैल को ऑक्सीजन की खपत 3842 मीट्रिक टन थी. मतलब यह कि उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा था. यानि हम ऑक्सीजन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर थे ? लेकिन अगर अचानक मांग बढ़ गई तो उसकी पूर्ति के लिए हमारी आपूर्ति व्यवस्था तैयार नहीं थी. वास्तव में ऑक्सीजन की कमी इसी वजह से पैदा हुई है.
देश में गहराते कोरोना संकट के बीच मरीजों के लिए ऑक्सीजन की जरूरत और मांग बढ़ गई है. पिछले हफ्ते ही केंद्र सरकार ने अस्पतालों को किफायत से ऑक्सीजन का इस्तेमाल करने और ऑक्सीजन की बर्बादी रोकने के उपाय करने को कहा था. ऐसा पहली बार हुआ कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को खुद आक्सीजन की उत्पादन और आपूर्ति के लिए समीक्षा करना पड़ी . समीक्षा के बाद विवादास्पद पीएम केयर्स फंड से देश के 100 नए अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट लगाने और 50 हजार मीट्रिक टन ऑक्सीजन के आयात करने का फैसला किया गया अब इसे अमली जामा पहनाने में कितना वक्त लगेगा ,कोई नहीं जानता ?
आक्सीजन न मिलने से भोपाल में हमारे एक शायर मित्र जहीर कुरैशी की अकाल मौत हो गयी. देश भर में न जाने कितने जहीर कुरेशी ऐसे अभागे निकले जिन्हें कि जीवनदायनी आक्सीजन गैस नहीं मिल सकी .कहीं सिलेंडर नहीं थे तो कहीं सिलेंडर खाली थे .असल समस्या ऑक्सीजन सिलेंडर की मांग या जरूरत न होकर उसकी आपूर्ति है. 12 अप्रैल तक ऑक्सीजन सिलेंडर की मांग कम थी लिहाजा क्षमता से आधे का उत्पादन हो रहा था. हकीकत ये है कि मांग के अनुरूप उत्पादन का स्तर बढ़ाने में और ऑक्सीजन सिलिंडर को अस्पताल के बेड तक लाने में वक्त लगता है.ये काम हाथों-हाथ नहीं किया जा सकता. इसी वक्त को ध्यान में रखते हुए बफर स्टॉक की जरूरत होती है. लेकिन, किसी को आसन्न संकट का अंदाजा ही नहीं था और शायद इसीलिए स्थिति का अनुमान लगाकर बफर स्टॉक बनाए रखने की जरूरत नहीं समझी गई.
मुझे याद है कि सरकार ने बीते साल कोरोना काल में ऑक्सीजन के उत्पादन-आपूर्ति की निगरानी के लिए उच्चस्तरीय कमेटी बनी थी. उस कमेटी ने अगर अपना काम पहले से किया होता तो ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी की मौजूदा स्थिति पैदा नहीं होती.कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में हर सातवें मरीज को आक्सीजन की जरूरत है ऐसे में ये संख्या लाखों तक पहुँच गयी है .इस बढ़ी हुई मांग को पूरा करने में कम से कम एक सप्ताह तो लग ही जाएगा .तब तक कितने कोरोना मरीज ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ देंगे ,कोई नहीं जानता
आक्सीजन संकट को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक पैमाना है जिसके अनुसार आईसीयू वाले मरीजों के लिए 40 लीटर और गैर आईसीयू वाले मरीजों के लिए 15 लीटर ऑक्सीजन होनी चाहिए. अगर दोनों ही किस्म के मरीजों की संख्या आधी-आधी मान कर जरूरत का आकलन करें तो एक लाख मरीजों में पहले 50 हजार के लिए ऑक्सीजन की जरूरत 20 लाख लीटर और दूसरे 50 हजार मरीजों के लिए ऑक्सीजन की जरूरत 7 लाख 50 हजार लीटर होगी. यानी 27 लाख 50 हजार लीटर ऑक्सीजन चाहिए होगी. दूसरे शब्दों में 3335 मीट्रिक टन की जरूरत हो जाती है. यही वह अतिरिक्त ऑक्सीजन है जिसकी तत्काल जरूरत है.
पहली प्राथमिकता अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी को दूर करना है. इसका एकमात्र उपाय मैन्युफैक्चर के पास से अस्पताल तक ऑक्सीजन की पहुंच जल्द से जल्द बनानी है. सरकार के पास देशभर में 1200 से 1500 टैंकर हैं जो ऑक्सीजन आपूर्ति के काम में लगे हैं. इन टैंकरों को जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करना भी बड़ी चुनौती होगी.
प्रधानमंत्री के स्तर पर ऑक्सीजन सिलेंडर के आयात और ऑक्सीजन प्लांट तैयार करने के फैसले से मरीजों की तात्कालिक समस्या का हल होता नहीं दिखता. इस फैसले का असर दो हफ्ते बाद ऑक्सीजन की जरूरत को पूरा करने के ख्याल से अहम है. अभी ऑक्सीजन सिलेंडरों की जो कमी दिख रही है उसे खत्म होने में सप्लाई चेन के ठीक होने का इंतजार करना पड़ेगा. इसमें कम से कम एक हफ्ते का वक्त जरूर लगेगा.
आक्सीजन संकट का मामला कितना गंभीर है इसका अनुमान आप और हम इसी बात से लगा सकते हैं कि इस मामले में देश की अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है.दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को इंडस्ट्रीज की ऑक्सीजन सप्लाई फौरन रोकने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने मैक्स अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि ऑक्सीजन पर पहला हक मरीजों का है।जस्टिस विपिन सांघी और रेखा पल्ली की बेंच ने कहा कि मरीजों के लिए अस्पतालों को ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में सरकार इतनी लापरवाह कैसे हो सकती है? आप गिड़गिड़ाइए, उधार लीजिए या चुराइए लेकिन ऑक्सीजन लेकर आइए, हम मरीजों को मरते नहीं देख सकते।
संतोष का विषय ये है कि सरकार के मुकाबले न्यायपालिका अभी भी आम जनता की जिंदगी के प्रति संवेदनशील है. जस्टिस विपिन सांघी और रेखा पल्ली की बेंच ने सर गंगाराम अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई की थी। बेंच ने कल भी केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि औद्योगिक संस्थानों में ऑक्सीजन की जो सप्लाई हो रही है, उसे क्यों न कोरोना मरीजों के लिए अस्पतालों को दिया जाए।कोर्ट ने कहा है कि इंडस्ट्री ऑक्सीजन का इंतजार कर सकती हैं, लेकिन मरीज नहीं। कोर्ट ने आगे कहा है कि मानवीय जान खतरे में है। बेंच ने कहा कि ये सुनने में आया है कि गंगा राम अस्पताल में डॉक्टरों को कोविड-19 रोगियों को ऑक्सीजन देने को कम करने के लिए मजबूर किया जा रहा था, क्योंकि वहां ऑक्सीजन की कमी थी।कोर्ट ने कहा, “ये कौन से उद्योग हैं जिनकी ऑक्सीजन की आपूर्ति पर रोक नहीं लगाई जा सकती है।”
बहरहाल कोरोना संक्रमण से बचाव करते हुए आने वाले दिनों में अदालत की फटकार के बाद भी ऑक्सीजन की आपूर्ति सहज सुलभ हो पाएगी ये कहना कठिन है. बड़े शहरों में इंतजाम हो भी जाये लेकिन कस्बों में तो ये नामुमकिन ही है.इसलिए अपनी जान की रक्षा आप खुद कीजिये,ऐसी स्थिति मत आने दीजिये कि आपका काम प्रकृति की ऑक्सीजन से न चले .सावधान रहिये और भगवान का भरोसा कीजिये.सरकार तो सरकार है उस पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं. आने वाले दिनों में रसोई गैस के अलावा अपने-अपने घर में ऑक्सीजन का एक-दो सिलेंडर जरूर रखिये .

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