पत्रकारों को सरकार ने छोड़ा राम भरोसे–?????

पत्रकार जिये या मेरे इससे सरकार को कोई लेना देना नहीं है इसका सीधा सा मतलब यह है कि पत्रकार सरकार के लिए मेरे जरूरी वस्तु बंनकर रह गया है ना आयुष्मान योजना का लाभ नाही विज्ञापनों का लाभ और ना ही मृत्यु होने पर सम्मान निधि का लाभ बस शासन की योजनाओं का बखान करते करते ही वह मर जाता है और घर परिवार को उम्र भर का जख्म बतौर उपहार दे जाता है मीडिया का चौथा स्तंभ कहलाने में भी अब शर्म सी महसूस होने लगी है क्योंकि बाकी के तीनों स्तंभ और उनसे जुड़े लोग इतने बेबस और लाचार नहीं है जितना चौथा स्तंभ का प्राणी हैं जरा अपने तीनों स्तंभों को लोगों की तरफ नजर डालकर देखो कितने मजे में हैं तीनों स्तंभ इस समय का चौथा स्तंभ इतना अधिक कमजोर है कि वह कितने दिनों तक जिंदा रहता है यह भी सोचनीय प्रश्न है आज कोरोना काल की विकट परिस्थितिओ में हमने सरकार से पत्रकार और उनके परिवारजनों को आयुष्मान योजना का लाभ शीघ्र ही घोषित किए जाने की मांग की थी परंतु सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी यह केसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है हम ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है सोच समझ कर मंन विचलित हो जाता है आज हमारे चौथे स्तंभ की यह हालात का जिम्मेदार चंद्र चाटुकार पत्रकार है जो मालामाल हो गए हैं जिन्हें अपने भाइयों का दर्द ही नहीं दिखता बस वह तो हर समय चापलूसी का नया विश्व कीर्तिमान बनाने में ही अपनी श्रेष्ठता संभालते हैं आज दो राहे पर पत्रकार और उसका परिवार खड़ा है हमने जिन पर भरोसा किया शायद वही हमारे भरोसे के काबिल नहीं थे जागो मित्रों जागो अब समय है सच और झूठ में से किसी को चुनने का बहुत चुन लिया झूठ को अब तो सच का

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