सेना का एकीकरण: सवाल से उठा बवाल

भारतीय वायु सेना को थल सेना की सहायक सेना कहे जाने पर तूफान खड़ा हो गया। जनरल रावत अपनी बातों पर फिर से गौर करें, तो शायद सहमत हो जाएँ किऐसी बात उपयुक्त नहीं है | वैसे भी दुनिया में सेना एकीकरण आसान और तनाव रहित नहीं रहा है। इसके लिए नागरिक नेतृत्व को आगे बढ़ना होगा और सुधार प्रक्रिया की जिम्मेदारी उठानी होगी, जिसमें एकीकरण पर अधिक बल देना भी शामिल है। लेकिन दुर्भाग्य से, अब तक ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा हैं।परिणाम , भारतीय सेना एक से दूसरे विवाद में फंसती चली जाएगी|
वैसे जनरल रावत ने एकीकरण को लेकर कुछ बहुत गहरी बातें कहीं हैं । इस पूरे मसले का असली मर्म यह है कि जनरल रावत ने उन बातों को जगजाहिर कर दिया है, जो अब तक आम लोगों के लिए गोपनीय थीं।पूर्व एयर चीफ मार्शल पी सी लाल इसे ‘सुप्रीमो सिंड्रोम’ कहा करते थे, यानी थल सेना द्वारा अन्य सेनाओं को अपने अधीन मानने की कथित प्रवृत्ति।

भारत में किसी भी सेना की बहुत कठोर आलोचना अनुचित है, जिसके कारण भी हैं। दरअसल, साझा व्यवस्था भारतीय सेना के डीएनए में ही शामिल नहीं है। यहां अधिकारियों का सामाजीकरण एक संकीर्ण और संकुचित एकल सेवा संबंधी सोच के साथ किया जाता है। जनरल रावत का करियर खुद इसका गवाह है कि उन्होंने किसी भी समय साझा संगठन में कोई पद नहीं संभाला। हालांकि, मसला सिर्फ इतना नहीं है। थल सेना और वायु सेना की पदोन्नति संबंधी नीतियां भी साझा संगठनों में सेवा को प्राथमिकता नहीं देतीं, बल्कि सभी अपनी-अपनी सेवा के ‘सर्वश्रेष्ठ’ अधिकारियों को अपने पास ही रखना चाहती हैं। नतीजतन, पिछले दो दशकों में उनके संभवत: एकाध प्रमुखों के पास ही साझा सेवा का कोई अनुभव रहा। भारतीय नौसेना की यहां तारीफ की जा सकती है, क्योंकि उसके कुछ प्रमुखों की पोस्टिंग दूसरी सेवाओं में भी हुई है।
एकीकरण को साकार करने का एक और तरीका है, सैन्य शिक्षा। इस मामले में भी हमारी व्यवस्था एकल सेवा को ही बढ़ावा देती दिखती है, जिसके कारण अपने से इतर सेवाओं के बारे में गलत धारणाएं बनती-बिगड़ती हैं। निस्संदेह, सीडीएस का पद गढ़ने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र नोदी ने भारतीय सेना के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन की शुरुआत की थी। लिहाजा, सेनाओं के बीच हम जो असहमति देखते हैं, वह स्वाभाविक ही है और अपेक्षित भी। हालांकि, अब असैन्य नेतृत्व को इसमें दखल देने और कदम बढ़ाने की जरूरत है।
ऐसे में कुछ सवाल खड़े होते हैं। क्या जब संयुक्त थिएटर कमांड बनेगा, तो क्या वह सीडीएस को रिपोर्ट करेगा? यदि हां, तो ब्रिटेन की तरह क्या यहां भी एक स्थाई संयुक्त मुख्यालय होगा? या फिर थिएटर कमांड अमेरिका से सबक लेते हुए सीधे रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करेगा? अगर ऐसा हुआ, तो क्या हम रक्षा मंत्रालय के समकक्ष कोई कार्यालय बनाएंगे? ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं और हमारे संस्थानों को परिभाषित करेंगे। मगर फिलहाल इनका कोई जवाब अभी किसी के पास नहीं है।इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण एक सवाल और भी है कि इस बदलाव के पीछे सोच किसकी है, और उसकी योजना क्या है?

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