मासिक किराए पर मिल जाते हैं लाइसेंस, नौसिखिए ३ हजार माह में बन जाते हैं मेडिकल स्टोर्स के संचालक

जिले में ४७५ मेडिकल स्टोर का संचालन

होशंगाबाद। जिले भर में चल रहे मेडिकल स्टोर्स में से अधिकतर दुकानें लंबे समय से नौसिखियों के भरोसे चल रही हैं। इन दुकानों पर टंगे लाइसेंस किसी ओर के नाम से हैं, जबकि यहां दवाओं की बिक्री किसी ओर के भरोसे की जा रही है।खास बात तो यह है कि मेडिकल स्टोर्स संचालकों को यह लाइसेंस आसानी से किराए पर भी मिल जाते हैं। इसके बाद इन्हीं लाइसेंस के आधार पर इन दवा की दुकानों का संचालन अन्य व्यक्ति कर रहे हैं। ऐसे में यह नौसिखिये आमजन के स्वास्थ्य को खतरे में भी डाल सकते हैं। नियमों की अनदेखी के बावजूद जिले के किसी भी मेडिकल स्टोर पर विभाग की ओर से समय-समय पर सख्ती से कार्रवाई तक नहीं की जा रही। किसी भी दवा दुकान पर दवाओं की बिक्री करने के लिए खुद फार्मासिस्ट का होना बेहद जरूरी है लेकिन अधिकतर दुकानों पर नौसिखिए ही दवाएं बेच रहे हैं। कुछ दिन तक फार्मासिस्ट के पास काम सीखने के बाद वे भी किराए के लाइसेंस पर दुकान का पंजीयन करवा लेते हैं ओर किसी ओर की डिग्री के आधार पर ही दुकान का संचालन करते हैं। ड्रग विभाग का कहना है कि उन्होंने फार्मासिस्ट नहीं मिलने पर समय समय पर दुकान के नाम पर नोटिस निकाले हैं, लेकिन इसका रिकार्ड विभाग के पास नहीं हैं।

जिले में सैंकड़ों दुकानें

जिले भर में शहरी व ग्रामीण क्षेत्र में करीब ४७५ मेडिकल स्टोर चल रहे हैं। अधिकतर ग्रामीण इलाकों में बिना लाइसेंस के भी दुकानों का संचालन हो रहा है। जहां झोलाछाप भी रोगियों का इलाज करते हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस बारे में ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

किराए में लाइसेंस…

गौरतलब है कि जिले भर में कई दवा विक्रेताओं के पास खुद की फार्मासिस्ट की डिग्री तक नहीं है। ऐसे में डिग्री होल्डर के लाइसेंस किराए पर लेकर दुकानें संचालित की जाती है। इसके लिए दवा विक्रेता लाइसेंसी को घर बैठे ही मासिक दो से अढ़ाई हजार रूपए बतौर किराए के रूप में देते हैं। किसी भी दवा की दुकान पर दवा की बिक्री के दौरान होने वाली गड़बड़ी का जिम्मेदार उस दुकान का लाइसेंस धारक ही होता है लेकिन अधिकतर दवा की दुकानें किराए के लाइसेंस पर चलाई जा रही है जबकि लाइसेंस धारक दुकान पर होते ही नहीं है।

इसलिए डॉक्टर को दिखाएं दवा

किसी भी अस्पताल में जांच के लिए जाने वाले मरीज को खुद डॉक्टर भी अक्सर दवा खरीदने के बाद उन्हें फिर से दिखाने की सलाह देते हैं। कई बार नौसिखिए डॉक्टर की लिखी पर्ची वाली दवा दुकान पर नहीं होने के कारण मरीज को एक जैसी दवा होने की बात कहकर थमा देते हैं। जिससे कई बार मरीज को रिएक्शन भी हो जाता है।

एक्सपर्ट व्यू

फर्मासिस्ट अतुल दुबे ने बताया कि दवाओं की दुकानों में फार्मासिस्ट का होना काफी जरुरी होता है। केमिकल और बॉन्ड की जानकारी सिर्फ फार्मासिस्ट को होती है। दवाओं को देने के साथ फार्मासिस्ट मरीजों को दवा खाने का सही तरीका और दवाओं के बीच में समय के अंतर की जानकारी भी देता है।

————————–

इनका कहना है

मेडिकल स्टोर में फार्मासिस्ट का नहीं बैठना एक बड़ी समस्या है। इसे मेडिकल इगनोरेंस माना जाता है। एेसा करने वालों की दुकानों को सस्पेंड किए जाने के प्रावधान है। लेकिन अभी जिले में नए ड्रग कंट्रोलर आए है। उन्हें जांच कर कार्रवाई व निरीक्षण के लिए कहा जाएगा। – डॉ.दिनेश कौशल सीएमएचओ होशंगाबादmedical medicine Pharmacy

About डीजी न्यूज़ मध्य प्रदेश

View all posts by डीजी न्यूज़ मध्य प्रदेश →

Leave a Reply