राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान (एनटीआरआई) नई दिल्ली और भारतीय आदिम जनजाति सेवा संगठन (बीएजेएसएस) के बीच समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर

प्रमुख विशेषतायें:

  • जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) उत्तराखंड के परामर्शाधीन राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने आदिम जनजाति सेवा संगठन, नई दिल्ली के साथ समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये, ताकि जनजातियों पर दुर्लभ पुस्तकों को संरक्षित, सुरक्षित और उनका डिजिटलीकरण किया जा सके तथा जनजातीय संग्रहालयों का पुनर्निर्माण और उनका डिजिटलीकरण हो सके।
  • दुर्लभ पुस्तकों के भंडार के रूप में डिजिटल पुस्तकालय की स्थापना तथा एनटीआरआई, नई दिल्ली में एक स्रोत केंद्र का सृजन

राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली और भारतीय आदिम जनजातीय सेवा संगठन (बीएजेएसएस) ने एनटीआरआई के स्रोत के रूप में बीएजेएसएस को विकसित करने के लिये जनजातीय मंत्री श्री अर्जुन मुंडा की उपस्थिति में 21 फरवरी, 2022 को एक समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं। एनटीआरआई की तरफ से टीआरआई उत्तराखंड के निदेशक श्री एसएस टोलिया और भारतीय आदिम जनजाति सेवा संगठन (बीएजेएसएस) के अध्यक्ष श्री नयन चंद्र हेमब्राम ने संस्थान की तरफ से समझौते पर हस्ताक्षर किये।

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इस अवसर पर श्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि आजादी के बाद बीएजेएसएस से कई प्रतिष्ठित हस्तियां जुड़ीं थीं और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उसके पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि बीएजेएसएस की स्थापना प्रसिद्ध समाजसेवी श्री ठक्कर बापा ने 1948 में की थी, ताकि भारत के जनजातीय समुदायों की पूर्ण समावेशी और आमूल उन्नति हो सके। श्री यूएन धेबार और श्री मोरारजी देसाई जैसे प्रसिद्ध राजनेता-समाजसेवी संगठन से जुड़े तथा उन्होंने जनजातीय समुदायों की उन्नति के लिये अपनी अमूल्य सेवायें दीं। झंडेवालान स्थित संस्थान के भवन के पुस्तकालय में दुर्लभ पुस्तकों का संकलन मौजूद है तथा जनजातीय कलाकृतियों का एक संग्रहालय भी है। यदि इस विरासत को संरक्षित, सुरक्षित न किया जाता और उसकी देखभाल न होती, तो यह विरासत खो सकती थी। जब देश आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने के क्रम में उत्सव मना रहा है, ऐसे समय में बीएजेएसएस को एनटीआरआई का स्रोत केंद्र बनाने से जनजातीय संस्कृति तथा इतिहास में छात्रों, शोधकर्ताओं और आगंतुकों की दिलचस्पी बढ़ेगी। वे दिल्ली में उपलब्ध इन सुविधाओं का भरपूर इस्तेमाल करेंगे तथा आने वाली पीढ़ियां समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित होंगी।

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जनजातीय कार्य मंत्रालय के सचिव श्री अनिल कुमार झा ने कहा कि परियोजना को जनजातीय कार्य मंत्री के मार्गदर्शन में चलाया जा रहा है। वे मंत्रालय के अधिकारियों के साथ परिसर में पधारे थे और उन्होंने सलाह दी थी कि एनटीआरआई के स्रोत केंद्र के रूप में अनोखी विरासत को विकसित किया जाये। श्री झा ने टीआरआई उत्तराखंड और टीआरआई ओडिशा के प्रयासों की सराहना की कि उन्होंने इस अनोखी विरासत को संरक्षित करने के लिये योजना तैयार की है।

भारतीय आदिम जनजाति सेवा संगठन (बीएजेएसएस) के अध्यक्ष श्री नयन चंद्र हेमब्राम ने माननीय मंत्री को धन्यवाद दिया कि वे अधिकारियों के दल के साथ मौके पर पधारे तथा पुस्तकों के संरक्षण और संग्रहालय के पुनर्निर्माण की पहल की, जो अब तक उपेक्षित थे। उन्होंने बीएजेएसएस की देशव्यापी गतिविधियों की जानकारी दी और आजादी के बाद की जनजातीय नीतियों तथा मुद्दों के हवाले से बीएजेएसएस की भूमिका पर प्रकाश डाला।

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आईआईपीए के महानिदेशक श्री एसएन त्रिपाठी ने कहा कि आईआईटी कानपुर राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय विकसित कर रहा है तथा जब पुस्तकों का डिजिटलीकरण हो जायेगा, तो उन्हें राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय में विशाल स्रोत के रूप में शामिल कर दिया जायेगा।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. नवलजित कपूर ने विस्तार से उन गतिविधियों के बारे में बताया जो पुनर्निर्माण परियोजना के तहत चलाई जायेंगी। उन्होंने परियोजना के पूरा हो जाने की समयसीमा के बारे में भी जानकारी दी।

मंत्रालय ने अनोखी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के उद्देश्य से बीएजेएसएस में दुर्लभ पुस्तकों का डिजिटलीकरण करने, उसे एक ई-पुस्तकालय के रूप में विकसित करने, जनजातीय संग्रहालय को दुरुस्त करने, कलाकृतियों का डिजिटलीकरण करने तथा संपर्क-केंद्रों की रचना करने के लिये 150 लाख रुपये की कुल धनराशि मंजूर की है।

इस अवसर पर टीआरई के निदेशक श्री राजेन्द्र कुमार, टीआरआई उत्तराखंड के निदेशक श्री एसएस टोलिया, एससीएसटीआरटीआई ओडिशा के निदेशक डॉ. एबी ओटा, एनटीआरआई की सुश्री नूपुर तिवारी, यूएनडीपी से सुश्री मीनाक्षी तथा बीएजेएसएस के अन्य प्रमुख कार्याधिकारी उपस्थित थे।

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