शासकीय चरक अस्पताल की लॉन्ड्री ने जो एक लाखों का घोटाला उगला उसने एक बार फिर व्यवस्था की पोल

“चरक के चोर पर और भी हैं मेहरबानियाँ”….?????

शासकीय चरक अस्पताल की लॉन्ड्री ने जो एक लाखों का घोटाला उगला उसने एक बार फिर व्यवस्था की पोल खोल के रख दी है…इस कारनामे में इस भृष्टाचार की मशीन बनी लॉन्ड्री के संचालक गुमास्ता कॉन्ट्रेक्टर पर हालफिलहाल 18 लाख की पैनल्टी और बिजली चोरी का 23 लाख की रिकवरी निकाली है जिम्मेदारों ने….अब सवाल ये उठता है कि इतना बड़ा घपला घोटाला क्या गुमास्ता अकेले कर सकता था…इसकी इस खुराफ़ात में विभाग के सहयोगी भी भागीदार हैं…तो उन्हें क्यों बख्शा जा रहा है…या ऐसे घपले घोटालों में विभाग के विभीषणों पर क्यों कार्यवाही नहीं होती…क्यों उन तमाम कारगुज़ारों को भरतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं के घेरे में लेकर उनके असली मुक़ाम हवालात में नहीं डाला जाता…

“बाघड़बिल्लों की बग़ैर मदद कैसे सम्भव घपले घोटाले”..

कोई भी घोटाला घपला घर वाले के सहयोग के बग़ैर अपने अंजाम तक पहुंचना नामुमकिन है…जैसे इस चरक के मामले को ही लें…यहाँ मैकेनिज्म लॉन्ड्री का ठेका मेसर्स गुमास्ते कॉन्ट्रेक्टर ज्योतिनगर को दिया गया था…अब ठेकेदार को कैसे पता चलेगा कि भृष्टाचार कहाँ से और कैसे हो सकता है…भृष्टाचार का रास्ता क्या हो सकता है जिससे घोटाला कर उम्मीद से कई गुना नफा कमाया जा सके…और इन घपले बाजों का साथ देते हैं वो बाघड़बिल्ले जो अपने ही विभाग की बाघड़ को भृष्ट-आचार (बुरे आचरण लालच) के दम सौदा कर बैठते हैं…लेकिन वरिष्ठ जिम्मेदार इन बाघड़बिल्लों की कारगुजारी को अनदेखा करके सिर्फ बाहरी अर्थपिशाचों पर कार्यवाही का डंडा बजा कर इतिश्री कर लेते हैं…अब लाखों की रिकवरी मात्र उस ठेकेदार का दंड है…जो उसने ऐसी तरह ना जाने कब और कहाँ कहाँ से कमाया लिया होगा…जबकि वो भारतीय दंड विधान की विभन्न धाराओं का भी हक़दार है…ख़ैर अगर जिम्मेदार चाहें तो और भी हैं मामले ठेकेदार के जो खुले ऐसे ही तो कई खुलासे हो सकते हैं….

“अब अन्य कर्म भी शंका में”….

पुख़्ता सूत्रों की मानें तो चरक की लॉन्ड्री कांड और बिजली चोरी की जिम्मेदार फर्म गुमास्ते ने खाने पीने में भी खूब जोरदार काम किया है…किसी समय भोजन का संचालन भी यही पांडुरंग देवा करते थे…जिसके लाखों के बिल भुगतान आँख मूंद कर जिम्मेदार करते रहे…वहीं सूत्र तो ये भी बताते हैं कि चरक की ऊपरी मंजिल पर पकड़ाए चकला घर के संचालन में भी गुमास्ता कानून लागू था…मतलब इस फर्म के कर्णधारों की महती भूमिका थी लेकिन औरों की तरह इसे भी उस कलंक से मुक्त कर दिया गया…वैसे ग्रिड पर काम करते करते ही घपले घोटालों का मास्टरमाइंड का हुआ जन्म….

“बिजली के झटके नुमा लगा रहा झटका”….

अब आप सुधि पाठकों को यहाँ ये बताना जरूरी है कि अगर ये घोटाले बाज अस्पताल की चादर और अन्य धुलाई के बिलों में ओवर राइटिंग कर मनमाफ़िक राशि बढ़ाने का लालच नहीं करता तो ये खेल कभी भी पकड़ में नहीं आता…और क़रीब आधे खोखे का ये घोटाला भृष्टाचार के गर्भ से कभी बाहर आना सम्भव ही नहीं होता…ख़ैर अब आगे की इनके ख़ैर ख्वाह जानें… लेकिन सूत्र बताते हैं कि इस घोटाले का मास्टरमाइंड खुद बिजली के ग्रिड पर काम करते करते झटके सहते सहते ही ऐसे शातिराना कारनामों उस्ताद बन गया….हालांकि फर्म का मालिकाना हक परिवार के सदस्य के नाम है…लेकिन गुमास्ते के गुमान पर कइयों का वरदहस्त है…..

“गुमास्ता… गुमान..और आका”….

मेसर्स गुमास्ते को अपनी कारगुजारीयों पर बेख़ौफ़ गुमान इसलिए भी है कि सूत्र बताते हैं कि इन पर भगवान पांडुरंग के साथ ही सत्ताधारी पार्टी की एक इकाई और नेताओं से घनिष्ठता है…जिसके दम पर लाखों के घपले घोटालों को अंजाम तक पहुंचाने में इन्हें किसी प्रकार का कोई गुरेज़ और खौफ़ नहीं रहता….

क़ायदा तो ये कहता है कि इस घोटाले बाज फर्म के इस और पहले के मामलों की बारीकी से जाँच करके भारती दंड विधान 1860 के तहत विभन्न धाराओं में इस पर और इसके सहयोगी बाघड़बिल्लों पर सख़्त से सख़्त कारवाही का हंटर चलना चाहिए…आगे बड़े जिम्मेदार जैसे उचित समझें… इस मामले के मेन किरदार फर्म के और भी खुलासे अभी बाकी हैं…बस आप सुधि बनें रहें जलवे के साथ…तब तक आप अपना जलवा क़ायम रखें और मुझे आज्ञा दें… फिर मिलने के वादे के साथ…और हाँ दुनिया जले तो जलने दें…

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