मोदी सरकार में बड़ी कंपनियों के हो रहे वारे न्यारे,खाद-बीज भी ई-कॉमर्स के हवाले

जो यूरिया इफको 266.50 रुपये का 45 किलो बेचती है, अमेजॉन पर वह 199 रुपये का एक किलो बिक रहा है। क्या यह उर्वरक की खुलेआम कालाबाजारी नहीं है? अमेजॉन के किसान स्टोर पर खाद-बीज की बिक्री का शुभारंभ खुद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किया है।

फ्लिपकार्ट भी यूरिया बेच रही है। 450 ग्राम यूरिया का दाम 130 किलो लिखा है। क्या किराने का सामान बेचने और फर्टिलाइजर बेचने में कोई फर्क नहीं है? क्या यूरिया जैसे आवश्यक उर्वरक को कोई भी कंपनी मनचाहे दाम पर बेच सकती है? इसके लिए किसी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है?

दरअसल, यह सब कृषि कारोबार को बड़ी कंपनियों के हवाले करने की योजना का हिस्सा है। सोचिये, देश में छोटे-बड़े कितने दुकानदार खाद-बीज की दुकान चलाते हैं। तो क्या उनकी दुकानों पर भी ताला लगवाने की तैयारी है। ऑनलाइन रिटेल आने के बाद छोटे व्यापारियों की क्या हालत है, दुकानदारों से पूछकर देखिये। लगता है अब खाद-बीज वालों के अच्छे दिन आने वाले हैं।

सरकार ने खाद-बीज के बाज़ार को ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए खोल दिया है। वह भी किसी चर्चा और नफे-नुकसान का आकलन किए बिना। कृषि कानूनों के मामले में भी ऐसा ही हुआ था।

कुछ लोग कह सकते हैं कि जब इतना कुछ ऑनलाइन बिक रहा है तो खाद-बीज भी बिकने दीजिये। क्या फर्क पड़ता है? लेकिन फर्क तो पड़ता है। वरना रिटेल में एफडीआई के खिलाफ भाजपा विपक्ष में रहते हुए विरोध-प्रदर्शन न करती। खुद आरएसएस से जुड़े संगठन दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनियों के तौर-तरीकों को लेकर शिकायत करते रहते हैं।

यहां सवाल सिर्फ व्यापार का नहीं है। यह पूरी कृषि और खाद्य व्यवस्था को कॉरपोरेट्स के हवाले करने कवायद है। इसलिए सवाल उठना चाहिए कि ई-कॉमर्स कंपनियों को खाद-बीज बेचने की छूट किसने दी है? कब दी है? खाद-बीज के व्यापार में ई-कॉमर्स को लेकर सरकार की आखिर नीति क्या है?

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