प्रदेश में आदिवासी वोट बैंक की सियासत, साधने में जुटीं बीजेपी-कांग्रेस!

47 सीटे आरक्षित वर्ग की हैं, जो प्रदेश में सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं

मध्यप्रदेश में भले ही विधानसभा चुनाव में लंबा समय बाकी हो, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस ने मिशन 2023 के लिए मैदानी तैयारियां शुरू कर दी हैं। यही वजह है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने के मामले में श्रेय लेने के लिए दोनों दल एक-दूसरे पर हमलावर रहे। अब दोनों दलों का फोकस एक बार फिर आदिवासी वोट बैंक साधने पर है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ बड़वानी में आदिवासी अधिकार यात्रा का आगाज करेंगे, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह गोंड राजाओं की राजधानी रहे जबलपुर में 18 सितंबर को अभियान की शुरुआत करेंगे। बीजेपी ने अमित शाह के कार्यक्रम के लिए 18 सितंबर का दिन इसलिए चुना है, क्योंकि इसी दिन वर्ष 1858 को अंग्रेजों ने गोंड राजा रघुनाथ शाह और शंकर शाह को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया था। अमित शाह इसी दौरान आजादी-75 और आधुनिक भारत कार्यक्रमों का शुभारंभ करेंगे। इस कार्यक्रम के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। दोनों बलिदानियों का आदिवासी समुदाय में काफी प्रभाव है। इनके सम्मान से आदिवासियों के बीच भाजपा की पैठ बढ़ाने की रणनीति भी इसे माना जा रहा है।
प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें आरक्षित अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। सामान्य वर्ग की 31 सीटों पर भी आदिवासी समुदाय निर्णायक भूमिका में हैं। 2003 के पहले आदिवासी वोट बैंक परंपरागत रूप से कांग्रेस का माना जाता था। बीजेपी ने इसमें सेंध लगा दी। आदिवासी कांग्रेस से छिटक गए। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 47 आदिवासी सीटों में से 30 सीटें मिली थीं, बीजेपी को 16 सीटों से संतोष करना पड़ा।

जयस का प्रभाव रोकने की तैयारी

जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन (जयस) का मालवांचल में प्रभाव बढ़ रहा है। यह प्रभाव महाकौशल-विंध्य क्षेत्र तक न पहुंचे, इसलिए बीजेपी इन क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए आयोजन कर रही है। यह क्षेत्र विधानसभा और लोकसभा सीटों के लिए आदिवासी बहुल वाला है।
मंडला, डिंडौरी, अनूपपुर, उमरिया आदि जिलों में आदिवासी जनसंख्या अधिक है। मंडला और शहडोल लोकसभा की सीट आदिवासी हैं, तो 15 से अधिक विधानसभा सीटों पर यह वर्ग निर्णायक वोटर है। जयस अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए महाकौशल-विंध्य की ओर बढ़ रहा है। चुनाव के समय यह वर्ग जयस के पक्ष में जाए, इसे लेकर भाजपा अभी से जुट गई है।

कमलनाथ ने बड़वानी क्यों चुना?

बड़वानी, धार, आलीराजपुर (मालवा-निमाड़ क्षेत्र) को जयस (जय युवा आदिवासी संगठन) का गढ़ माना जाता है। बीते कुछ वक्त से कांग्रेस, आदिवासियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। अगस्त में डेढ़ दिन चले विधानसभा सत्र के दौरान भी देखा गया कि विश्व आदिवासी दिवस के मुद्दे को कांग्रेस ने जमकर उठाया। अब कांग्रेस 2023 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। कांग्रेस 6 सितंबर को बड़वानी में आदिवासी अधिकार यात्रा निकालने जा रही है। आयोजन के बहाने कांग्रेस बड़वानी और उससे लगे आधा दर्जन जिलों को कवर करने की कोशिश में है। बड़वानी के साथ धार, खरगोन, मंदसौर और नीमच जिलों के आदिवासियों को लेकर कांग्रेस बड़ा आयोजन करेगी।

कांग्रेस से दूर हो रहा जयस

जयस आदिवासियों के प्रमुख संगठन के रूप में उभरा है। कांग्रेस भी जयस को समर्थन दे रही है। 2018 चुनाव में जयस नेता डॉ. हीरालाल अलावा को कांग्रेस ने टिकट दी और वे जीते। अब हालात बदलते दिख रहे हैं। वजह है कि कांग्रेस की 15 महीने की सरकार में जयस का कांग्रेस पर से भरोसा खत्म होता दिखा। अब जयस के निशाने पर कांग्रेस-बीजेपी दोनों हैं।

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