टेराकोटा के जरिए बड़े चित्रकारों की कलाकृति को सहेज रहे हैं डा. तोमर

DG NEWS SEHORE

संवाददाता सुरेश मालवीय 8871288482

सीहोर । अमृता शेरगिल की कला ने भारतीय कलाकारों की पीढ़ियों को प्रभावित किया है और महिलाओं की दुर्दशा के उनके चित्रण ने उनकी कला को भारत और विदेशों में बड़े पैमाने पर महिलाओं के लिए एक प्रकाश स्तंभ बना दिया है। भारत सरकार ने उनकी कृतियों को राष्ट्रीय कला कोष घोषित किया है और उनमें से अधिकांश को नई दिल्ली के राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय दीर्घा में रखा गया है। उनकी कुछ चित्र लाहौर संग्रहालय में भी हैं। 1978 में भारतीय डाक द्वारा उनकी चित्र हिल वुमन को दर्शाते हुए एक डाक टिकट जारी किया गया था और लुटियंस दिल्ली में उनके नाम पर अमृता शेरगिल मार्ग है। उनके काम को भारतीय संस्कृति के लिए इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि जब इसे भारत में बेचा जाता है, तो भारत सरकार ने यह निर्धारित किया है कि कला को देश में रहना चाहिए। उसके दस से भी कम चित्र विश्व स्तर पर बेचे गए हैं। 2006 में नई दिल्ली की एक नीलामी में उनकी चित्र धविलेज सीनध छह करोड़ 90 लाख में बिकी, जो उस समय भारत में एक चित्र के लिए दी जाने वाली सबसे अधिक राशि थी। इस तरह के कई ख्यात चित्रकारों ने कला के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इन कलाकारों की अमूल्य कलाकृतियों को सहजने के कई प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसा ही एक प्रयास जिले के माटी कलाकार डा. बलवीर तोमर भी कर रहे हैं। वे कलाकारों की प्रसिद्ध चित्रकारियों के प्रतिरूप बना रहे हैं। जो टेराकोटा के माध्यम से बनाए जा रहे हैं। उनका मानना है कि मिट्टी से बनाए जाने वाली कृतियां कभी खत्म नहीं होती। क्योंकि मिट्टी का कभी क्षरण नहीं होता।

डा. बलवीर तोमर बताते हैं कि टेराकोटा एक लैटिन शब्द से आया है जिसका अर्थ है पकी हुई मिट्टी। इस कला में टेराकोटा मिट्टी से विभिन्ना प्रकार के बर्तनों, मूर्तियों और बर्तनों को सुखना, गर्म करना और रंगना शामिल है। इसे शिल्प करने के लिए उपयोग की जाने वाली प्रक्रिया के आधार पर इसका रंग प्राप्त होता है। जबकि मिट्टी गर्म होती है, भट्टी के वेंट के माध्यम से धुएं को पारित करने पर हमें नारंगी रंग मिलता है। दूसरी ओर, ग्रे या काले रंग को प्राप्त करने के लिए बंद वेंट का उपयोग किया जाता है। तापमान सीमा 800 से 1000 डिग्री सेल्सियस के बीच होती है। टेराकोटा का इतिहास हमें 8000 ईसा पूर्व में ले जाता है। वहीं जब उनसे पूछा गया कि वे पेंटिंग के प्रतिरूप को बना रहे हैं तो उन्होंने बताया कि टेराकोटा कला की मूर्ती मिट्टी से बनाई जाती हैं। जो कभी खराब नहीं होतीं। इससे कलाकारों की कृतियां संरक्षित की जा सकेंगी। कलाकारों की कृतियां अमूल्य है और वे हमारी अगली पीढ़ियों तक पहुंचना चाहिए। इसके साथ ही वे राजा रवि वर्मा, लिओनार्दो दा विंची और कई अन्य कलाकारों की कृतियों के प्रतिरूप बना रहे हैं।

राज्य और राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला

डा. तोमर की कृतियों को देश की कई प्रदर्शनियों में स्थान मिल चुका है। वहीं उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उन्हें राज्य स्तर का माटी कला बोर्ड और राष्ट्रीय स्तर का माटी कला बोर्ड का पुरस्कार मिल चुका है। जिससे शहर का नाम देश भर में बढ़ा है। उन्होंने कोरोना के लाकडाउन में भी कई मूर्तियां बनाई हैं।

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