प्रदेश में पंचायत चुनाव पर सुप्रीम घमासान

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मध्यप्रदेश सरकार की ओबीसी रिपोर्ट है अधूरी, नहीं दे सकते चुनाव में आरक्षण
  • क्या जानबूझकर सरकार ने पिछड़ा वर्ग का हक छीना?
  • ओबीसी आरक्षण पर कमलनाथ का पलड़ा भारी
  • गुजरात मॉडल पर नहीं पिछडे होने के कारण भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया- नरोत्तम मिश्रा
  • लेख – विजया पाठक

 

मध्यप्रदेश में पिछले काफी लंबे समय से लंबित चल रहे पंचायत चुनावों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश की शिवराज सरकार को बड़ा झटका दिया है। चार महीने से अधिक समय तक चले इस सियासी घमासान में जीत कांग्रेस पार्टी की हुई है। अब प्रदेश की वर्तमान सरकार के पास एक ही विकल्‍प है कि वह कोर्ट के आदेश के अनुसार समय-सीमा में पंचायत चुनाव कराए। जिसके लिए सरकार काफी समय से टालमटोल कर रही थी। ओबीसी आरक्षण को लेकर मचे सियासी घमासान में बीजेपी सरकार कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। दरअसल वर्ष 2018 में जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार बनी तो उन्होंने पंचायत चुनाव कराये जाने से पूर्व प्रदेश में परिसीमन करते हुए सीटों में इजाफा किया। इस इजाफे में कांग्रेस पार्टी ने ओबीसी सीटों को बढ़ाये जाने की तैयारी की थी। लेकिन सत्ता में वापसी करते ही शिवराज सरकार ने कमलनाथ सरकार के समय के परिसीमन को रद्द किया और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू रखा। पूर्व की सीटों पर ही 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के साथ पंचायत चुनाव कराये जाने के लिए राज्य सरकार ने तैयारी की। लेकिन काफी विरोध के बाद कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और कोर्ट के आदेश के बाद पंचायत चुनाव टालने पड़ गये थे और कोर्ट ने राज्य में ट्रिपल टेस्ट से चुनाव कराये जाने के आदेश दिये थे।

एक तरफ जहां कमलनाथ सरकार ने पंचायत चुनाव में ओबीसी को 27% आरक्षण देने की घोषणा से पिछड़ा वर्ग के मन में स्थान बनाया है। वहीं दूसरी तरफ बौखलाकर भाजपा नेता गलत बयानी में उतर आए हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने इसके पीछे कांग्रेस को जिम्मेदार बता दिया, क्योंकि वो अदालत गए थे। यहां सवाल उठता है कि बीजेपी ने 2018 का परिसीमन रद्द कर 2014 के परिसीमन के साथ चुनाव कराने की घोषणा ही क्यों की? चुनाव चिन्ह बाटें ही क्यों? जो सरपंच और अन्य पदों के उम्मीदवार जिन्होंने पंचायत चुनाव के लिए चुनाव सामग्री बनवा चुके थे उनकी भरपायी कौन करेगा? इसके मद्देनजर ही सरकार पंचायत चुनाव से बच रही थी। गुजरात मॉडल पर नहीं पिछडे होने के कारण भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया- नरोत्तम मिश्रा
अब इस मामले में भाजपा पूरी तरह फंसती नजर आ रही है और पिछड़े वर्ग का जो गुस्सा चुनाव पर निकलना तय है। इस बात से पिछड़े वर्ग के साथ बहुत बड़ा कुठाराघात हुआ है। वहीं नरोत्तम मिश्रा एक कदम और आगे जाकर बोल दिया कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पिछड़े वर्ग से आने के कारण बनाया। अब इनको कौन समझाए कि यहां बात पंच-सरपंच की हो रही है, ना कि विधायक, सांसद या प्रधानमंत्री के चुनाव की हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब बीजेपी इस मामले में फंस गयी है। सारे नेता बचाव की मुद्रा में आ गये हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री अपना विदेश दौरा रद्द कर कानूनी राय ले रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने शिवराज सिंह और नरोत्तम मिश्रा को दिल्ली तलब किया। क्‍योंकि मामला देश के 40% वोट बैंक से जुड़ा है।

रिव्यू पिटीशन में सरकार को राहत का आसार काफी कम

सुप्रीम कोर्ट में पूर्व मंत्री व पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष गोरी शंकर बिसेन की अध्यक्षता में तैयार की गई रिपोर्ट में जो जानकारी कोर्ट को दी गई, उससे कोर्ट पूरी तरह से असहमत दिखी। सरकार ने 49% आबादी बताते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए मप्र में 35% आरक्षण मांगा था, लेकिन रिपोर्ट तैयार करने में लापरवाही कर दी। निकायवार रिपोर्ट ही नहीं बनाई और कोर्ट के सामने पिछड़ा वर्ग आयोग और शिवराज सरकार की अधूरी जानकारी की पूरी कलई खुल गई है। खुद को ओबीसी वर्ग का मसीहा बताने वाली शिवराज सरकार अब रिव्यू पिटीशन दायर करने की तैयारी में है।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को लगाई फटकार
इस पूरे मामले में चुनाव आयोग की भूमिका को भी कोर्ट ने संदेह की स्थिति से देखा है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को भी फटकार लगाते हुए साफ शब्दों में कह दिया है कि राज्य में पहले की तरह तय नियमों के साथ शीघ्र पंचायत चुनाव कराये जाये। जबकि किसी भी राज्य में चुनाव आयोग एक स्वतंत्र बॉडी होती है जिसकी जिम्मेदारी राज्य में सुचारू ढंग से समय-समय पर चुनाव करवाने की जिम्मेदारी होती है। बताया जा रहा है कि राज्य निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष पूर्व मुख्य सचिव बीपी सिंह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और भाजपा के करीबी हैं, उन्हें जानबूझकर ही मुख्य सचिव पद से रिटायर होने के बाद शिवराज सरकार ने राज्य चुनाव आयोग का अध्यक्ष बनाया था ताकि वे सरकार के हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लें। जब पंचायत चुनाव पर घमासान ही करना था तो चुनाव आयोग ने चुनाव कराये जाने को लेकर पहले आदेश क्यों जारी किये। आयोग के आदेश का परिणाम ही था कि लोगों ने अपने चुनाव चिन्ह और चुनाव की पूरी तैयारी कर ली थी।

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