मजदूर के बेटे आईपीएस का सफ़र, और अब

अम्बिकापुर – घोर नक्सलवादी क्षेत्र बीहड़ों में नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में लाने वाले देश के ‘जाबांज’ एवं ‘आदर्श’ आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी देश के वो सपुत हैं, जिन्होंने रोजी मजदूरी जैसे कार्य से लेकर देशहित एवं सेवा करते वर्तमान में छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में आईजी का प्रभार संभाला है। यह आलेख जरूर आपको लंबा लगे पर देश के इस सपुत की यात्रा हमें एक बार अवश्य पढ़ लेनी चाहिए। संवेदनशील माओवादी क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल द्वारा 2 बार पुलिस ‘वीरता’ पदक तथा उत्कृष्ट प्रशासनिक सेवा के लिए छ.ग. के महामहिम राज्यपाल से सम्मानित।

आज के ही दिन 01 अगस्त 1973 को देश में राजस्थान के नागौर जिले की परबतसर तहसील के ‘मालास’ नामक एक छोटे से गांव में इनका जन्म हुआ था। परिवार की माली हालत इतनी खराब थी कि इसे याद करते स्वयं भाव विभोर हो जाते हैं। इस पायदान तक पहुंचने में विषम आर्थिक परिस्थितियों के चलते काफी बाधाएं आई पर ‘आत्मविश्वास’ गिरने नहीं दिया। मजबूत हौसले का ही परिणाम रहा कि सफलता के प्रथम पायदान में ही यह मेघावी छात्र शिक्षक बन गया। जहां इस सेवा से परिवार की जरूरतों को पूरा करने कोई तकलीफें नहीं थी, लेकिन लक्ष्य ऊंचा था। शिक्षक की नौकरी के बाद उन्होंने राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा में प्रथम प्रयास में उन्हें सफलता मिली और वे ‘सेल्स टैक्स इंसपेक्टर’ बन गये।

यही नहीं इसके बाद सफलता के तीसरे पायदान में तहसीलदार पद पर चयन हो गया। इसी दौरान  देश की कठिन परीक्षा सिविल सर्विसेस (युपीएससी) की परीक्षा में सफलता मिली और 2003 में भारतीय पुलिस सेवा में चयन हुआ। उन्हें छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे संवेदनशील नक्सली प्रभावित जिलों (बस्तर, बीजापुर, कांकेर में एस० पी० व डी० आई० जी० कांकेर दंतेवाड़ा, राजनांदगंव) में अपनी सेवाएं दी। इसी संवेदनशील क्षेत्र कांकेर जिले सहित सुदूर क्षेत्रों में वे शांति स्थापित करने में सफल होते गए जिसकी चर्चा प्रशासनिक हल्कों में खूब हुई। बस्तर क्षेत्र में सेवा करते हुए लोगों को शिक्षा के लिए प्रेरित करते रहे। वे एक ही शब्द कहते थे कि ‘बंदूक से ज्यादा कलम की ताकत’ है, इसका उपयोग देश सेवा देश हित में किया जा सकता है।

रतनलाल डांगी की व्यवहार, आदर्श, कर्तव्य के लोग कायल हुए और इसी का प्रतिफल रहा कि सैकड़ों नक्सलियों ने अपने हथियारों के साथ आत्म समर्पण कर दिया और समाज की मूल धारा में आकर रहने का निर्णय लिया। आत्मसमर्पित नक्सली बेहतर ‘जीवनयापन’ कर रहे है। शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित करते हमेशा इस बात की शिक्षा दी कि जीवन में दो चीजें आवशयक है प्रथम शिक्षा और दूसरा आजीविका। शिक्षा हमें ऊंचे ‘शिखर’ को ले जाती है, आजीविका के लिए भोजन मूल्यवान है। भोजन जीवन के लिए अनिवार्य है इसी तरह शिक्षा सामाजिक जीवन में सफलता के लिए। संघर्श जीवन का अंग है और इससे कभी दूर ना भागे अपितु इससे संघर्ष करें। रास्तों में पहाड़ आने के बाद हमेशा उसे पार करने पर मैदान आता है। अपने कार्य में सफलता पर इस ‘आदर्श’ एवं ‘कर्तव्यनिष्ठ’ अधिकारी को भी इस बात का पूरी तरह सकुन एवं विश्वास मिला कि उनका सेवा क्षेत्र में कार्य सफल रहा।

शिक्षा के क्षेत्र में आज भी स्वयं अपने संघर्ष के दिनों को याद करते स्वयं कहते हैं कि अगर मेरा बेटा सफलता पाता है तो उसका उतना अधिक महत्व नहीं है, लेकिन किसी किसान, मजदूर का बेटा आईएएस, आईपीएस या अन्य क्षेत्रों में सफलता अर्जित करता है तो वह समाज के लिए उदाहरण पेश करता है। जो आर्थिक रूप से सक्षम है, शिक्षा क्षेत्र में सफल है तो उसके साथ हर व्यक्ति साथ होता है पर असफल व्यक्तियों के साथ तो उनके करीबी ही साथ नहीं होता। हमें सफलता अर्जित करने के साथ अपने समाज, देश हित के लिए काम करें तो ही इसकी सार्थकता है। स्वयं के विकास के लिए ‘सफलता’ का कोई हश्र नहीं होता। सफलता के रास्ते शिक्षा से होकर जाते हैं, बिना ‘शिक्षा’ के मनुष्य पशु के समान हो जाता है। इसे ध्यान में रखते हुए हमें बेटा बेटी को समान नजरीए से देखते हुए दोनों की शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत है। रतन डांगी अपने स्कूली जीवन से कला जगत में रूचि रखते थे यही कारण है कि कला जगत के ‘कलाकारों’ हेतु उनका असीम स्नेह दिखायी देता है।

इसके साथ ही सामाजिक ‘सरोकार’ की भावना हमेेशा साथ रही है। आज भी वे कालेज एवं पुस्तकालय के लिए अत्यावश्यक पुस्तकों साहित्य से भरने की मुहीम चला रहे हैं। ग्रामीण तबके के लोगों की सहायता के लिए हमेशा वे आगे खड़े दिखायी देते हैं। साथ ही युवाओं के मार्गदर्शन के लिए “गाइड द युथ, ग्रो द नेशन” नाम से मिशन भी चलाते हैं, जिसका लाभ युवाओं को मिल रहा है। इसके साथ जागरूकता अभियान साइबर क्राइम मुहीम का भी आगाज किया है, जिसका अच्छा रिस्पांस नजर आया।

डांगी हमेशा एक ही शिक्षा देते कहते हैं – “सफलता आपका जन्मसिद्व अधिकार है और इस अधिकार को आपसे कोई नहीं छीन सकता।” हमेशा प्रयास करते रहें, अपना जज्बा कायम रखें हौंसला बना कर रखें सफलता कदम चुमेंगी। उन्होंने शिक्षा के लिए शहरों में जन्म होने और सफलता के लिए बड़ी इंटरनेशनल स्कूलों में पढ़ाई करने की मिथक को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि कड़ी मेहनत की जाये तो ग्रामीण बच्चे भी सफलता अर्जित कर सकते हैं। इस दौर में किसी बच्चे की सफलता अमूमन कहा जाता है कि यह तो उनका स्तर ही है उनके यहां सब उच्च शिक्षित हैं, इसे भी खारिज करते कहा कि जरूरी नहीं है कि पढ़े लिखे खानदान या शिक्षित माता पिता के बच्चे ही उच्च पदों हेतु सफलता अर्जित करते हैं बल्कि मेहनत लगन रही तो सामान्य गरीब परिवारों के बच्चे भी उच्च मुकाम हासिल कर सकते हैं।

प्रतिभाओं को सोशल मीडिया, समाचार पत्रों के सशक्त हस्ताक्षर कालम के माध्यम लाये जाने पर प्रसन्नता व्यक्त करते कहा कि इस प्रकार की नेक सोच एवं निःस्वार्थ भावना के लिए लेखक बधाई के पात्र है। आशा करते हैं कि छत्तीसगढ सहित देश की अन्य छुपी प्रतिभाएं सशक्त हस्ताक्षर कालम की साक्षी बनते इस माध्यम से सबके बीच होंगी।

Leave a Reply