” पप्पू ” के वाक् युद्ध के निहितार्थ

चूंकि भाजपा वालों को राहुल गांधी को ‘ पप्पू ‘ के नाम से पुकारना अच्छा लगता है इसलिए आज मै भी राहुल के लिए ‘ पप्पू ‘ शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ ताकि मुझसे भाजपा प्रेमियों की कुछ तो शिकायत कम हो .दरअसल मुद्दा संसद में पप्पू यानि राहुल गाँधी द्वारा भाजपा पर किया गया वाक् प्रहार है जो भाजपा की और से शुरू किये गए वाक्युद्ध का जबाब है . पप्पू के प्रहार का पहला असर तो ये हुआ कि केंद्र सरकार ने चीन के प्रति अपनी विदेश नीति को दुरुस्त करते हुए सांकेतिक तौर पर बदलाव किये और बीजिंग में होने वाले विंटर ओलिंपिक खेलों का आंशिक बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया है .अब न दूरदर्शन का खेल चैनल इस समारोह का सीधा प्रसारण करेगा और न भारतीय राजनयिक समारोह के उद्घाटन और समापन समारोह में नजर आएंगे
भारत सरकार के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए ,हालाँकि इस सांकेतिक विरोध से चीन के ऊपर कोई ख़ास फर्क पड़ने वाला नहीं है .आपको याद होगा कि दो दिन पहले ही संसद में राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि सरकार की गलत विदेश नीति की वजह से पाकिस्तान और चीन की नजदीकियां बढ़ीं हैं .राहुल गांधी ने संसद में जिन तेवरों के साथ भाषण दिया है उसकी अनुगूंज संसद के बाहर भी सुनाई दे रही है .राहुल के भाषण से कांग्रेसियोंमें आशा का संचार हुआ है तो भाजपाइयों के चेहरे उतरे हुए हैं और वे राहुल गांधी के प्रति दोबारा से आक्रमक होकर उन्हें पप्पू साबित करने में लग गए हैं .
भारत में जबसे संसद की कार्रवाई का सीधा प्रसारण शुरू हुआ है तब से मै और मेरे जैसे तमाम लोग इसमें दिलचस्पी लेते हैं देश में दूसरी बार भाजपा सरकार आने के बाद से संसद के सत्र लगातार नीरस होते जा रहे हैं.इसकी एक वजह तो ये है कि संसद के अनेक ख्यातिनाम वक्ता दिवंगत हो गए या पराजित होकर अपने घर बैठ गए .संसद में गाम्भीर्य और व्यंग्य-विनोद भी लगातार कम हुआ है .बहुत कम सांसद ऐसे हैं जो पूरी तैयारी से आते हैं और प्रभावी ढंग से बोलते हैं तो पूरी संसद और देश उन्हें सुनता है .इस देश ने हाल के वर्षों तक संसद में विपक्ष के नेताओं के रूप में अटल बिहारी बाजपेयी,चंद्र शेखर ,शरद यादव,सोम दादा को सुना तो सत्ता पक्ष के नेताओं के रूप में शशि थरूर और युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया, से लेकर इतिहास बन चुके लालू यादव तक को सुना है .सबके अलग अलग अंदाज रहे हैं .
संसद में अब सुषमा स्वराज,जेटली,कपिल सिब्बल,सीतारम येचुरी जैसे वक्ताओं की कमी बहुत खलती है .खैर नए सांसदों में भी बहुत से ऐसे हैं जिनसे देश को उम्मीद नजर आती है. राहुल गांधी का नाम मै ऐसे सांसदों में सबसे अंत में ले रहा हूँ .राहुल के ताजा भाषण से ये उम्मीद और बलवती हुई है. राहुल इस देश के कभी प्रधानमंत्री बनें या न बनें लेकिन वे यदि संसद में बने रहें तो सत्ता के कुंजर पर अंकुश का काम जरूर कर सकते हैं ,क्योंकि उनके पास वक्तव्य कला है.वे हिंदी और अंग्रेजी में बोलते हुए न हास्यास्पद होते हैं और न उनके उच्चारण उन्हें परिहास का विषय बनाते हैं .राहुल की मुद्राओं में नाटकीयता का रंग भी सीमित है .इस हिसाब से वे सत्तारूढ़ दल के लिए सिरदर्द की वजह हो सकते हैं .
मुझे लगता है कि भाजपा के पप्पू और कांग्रेस के राहुल गांधी जैसे संसद में बोले हैं वैसे ही यदि सड़कों पर बोलने लगें तो आने वाले दिनों में राजनीति का परिदृश्य बदल सकता है .हांसिये पर खड़ी राजनीति को प्रासंगिक बनाने के लिए राहुल गांधी और उनके जैसे तमाम वक्ताओं की जरूरत कांग्रेस को है .भाजपा के पास बिना अभिनय और गंभीरता से बोलने वाले वक्ताओं का अब घोर अभाव है .कुल सात साल में ही भाजपा के तमाम श्रेष्ठ वक्ताओं की भाव-भंगिमाएं अब बदल चुकी हैं. वे धीरे-धीरे कर्कश या नीरस होते जा रहे हैं .या फिर उन्होंने उनकी श्रेष्ठ वाकपटुता की वजह से ही किनारे कर दिया गया है .
मै चूंकि स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी के शहर का हूँ इसलिए मुझे अच्छे वक्ता हमेशा से पसंद रहे हैं फिर चाहे वे किसी भी दल के रहे हों. मुझे यदि अटल जी प्रभावित करते थे तो स्वर्गीय माधवराव सिंधिया भी प्रभावित करते थे. ये दो ही सांसद हैं जिनकी भाषण शैली आम आदमी के दिल में सीधी उतरती थी. ग्वालियर के एक और संसद रहे जयभान सिंह पाविया की भाषण शैली में से यदि उनकी भाव मुद्रा को अलग कर दिया जाये तो उसे श्रेष्ठ कहा जा सकता है .सुषमा स्वराज ,अरुण जेटली का नाम मै ले ही चुका हूँ .मुझे अक्सर पीलू मोदी ,और प्रकाशवीर शास्त्री जैसे वक्ता भी याद आते हैं. इंदिरा गाँधी की तो बात ही अलग है यहां तक कि राम विलास पासवान एक अच्छे वक्ता माने जाते थे ,लेकिन अब श्रेष्ठ वक्ताओं की कमी से जूझ रही है संसद .
आज की संसद में बजीरे खजाना सुश्री सीतारमण जैसी विदुषी हैं लेकिन वे जब बोलतीं हैं तो प्रभावित नहीं करतीं. गृहमंत्री बोलते हैं तो लगता है कि जैसे कोई नमक का दारोगा बोल रहा है .प्रधानमंत्री जी की भाषण शैली का तो कोई मुकाबला है ही नहीं.उन्होंने अपनी भाषण शैली के बल पर ही 2014 में आमचुनाव की तस्वीर बदल दी थी लेकिन उनके उच्चारणों में जो दोष है वो हमेशा खटकता है. वे केवल गुजराती अच्छी बोलते हैं लेकिन उनकी हिंदी और अंग्रेजी हमेशा खटकती है .मुमकिन है कि मेरे कानों ने हमेशा सुनने में गलती की हो लेकिन गैर हिंदी भाषी तमाम ऐसे नेता हैं जो अपने उच्चारण दोष के बावजूद प्रभावित करते थे .उदाहरण के लिए लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष मनोहर जोशी .सोमनाथ चटर्जी,सुमित्रा महाजन ,पीए संगमा .
बहरहाल बात पप्पू उर्फ़ राहुल गांधी की हो रही है .राहुल कांग्रेस के नेता के रूप में भले ही दो चुनावों में नाकाम रहे हों ,भले ही वे पार्टी को पिछले सात साल में रसातल में ले जाने के आरोपी माने जाते हों,भले ही उनके कार्यकाल में कांग्रेस में लगातार बिखराव आया हो लेकिन वे बोलने की कला में लगातार निखरे हैं और यहां तक कि अपनी बहन प्रियंका और मान शरीअती सोनिया गांधी से बेहतर वक्ता के रूप में उभरे हैं .वे न प्रेस का समाना करने में लजाते हैं और न उन्हें हर वक्त टेलीप्रॉम्प्टर की जरूरत पड़ती है .वे तैयारी से बोलते हैं और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोलते हैं .राहुल का यही बोलना भाजपा के लिए खतरा है.अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह खतरा आभासी साबित होता है या वास्तविक

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