8 सालों में कुछ काम नहीं कराया सरपंचों ने और अब वोट मांगे कैसे कांग्रेस बीजेपी के नए सरपंच एवं पूर्व सरपंच जो पुनः है देख रहे हैं सरपंच बनने का ख्वाब

सरपंच विकास के नाम पर लूटते रहे जनता को

चुनाव की तारीख नजदीक आते ही आप पर साक्षी सोच रहे होंगे कि विगत वर्षों से कई बहाने लेकर ग्राम पंचायतों में विकास के कार्य टालते रहे सरपंच और सचिवों ने सिर्फ अपनी जेब ही भरी है यह कहना गलत नहीं होगा कि 2 साल तो कोरोना काल में ही कट गए एवं बाकी बचे साल इधर-उधर के बहाने बनाने में ही निकल गए जनता बेचारी क्या करें ग्रामीण लोग वैसे भी सीधे-साधे स्वभाव के होते हैं सच माने तो इतना कुछ जानते भी नहीं है कि ऊपरी विभागों में अपनी शिकायत करें तो कैसे बस गांव में सरपंच सचिव रोजगार सहायक इनमें से सबसे ज्यादा कलेक्ट्री तो गांव पंचायतों के सचिव ही दिखाते हैं एवं अपने आप को कलेक्टर से कम नहीं समझते क्योंकि सारा दायित्व तो सचिव का ही होता है कहां से कितना पैसा निकालना है किस योजना में कितना पैसा देना है कितना पैसा बचाना है कितना जनता को देना है कितना खुद को खाना है आदि आदि सभी बातों का ध्यान रखते हुए सचिव महोदय कलेक्टर का दायित्व निभाते हुए जनता को बेवकूफ बनाते रहे हैं क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों से अभी तक आ चुआदि शिकायतों में सूत्रों के अनुसार डी जी न्यूज़ निष्पक्ष खबर पुष्टि नहीं करता परंतु यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री आवास योजना ग्राम शौचालय योजना और कई ऐसी योजनाएं हैं ग्राम पंचायतों के सचिवों ने जमकर चांदी काटी है क्योंकि देखने में और सुनने में ऐसा लगता है कि सचिव साहब तो बड़े ईमानदार और अपने आपको राजा हरिश्चंद्र की 49 वी पीढ़ी के वारिस हो परंतु सचिवों के ठाठ वाट देखिए चार पहिया वाहन से नीचे नहीं उतरते किसी किसी ने तो बड़े-बड़े मकान और उनमें नीचे से ऊपर तक अंदर से बाहर तक चकाचक पत्थर ही पत्थर लगवा डालें जब भी जनपद पंचायत के कामों को लेकर जाते हैं तो कई सचिव तो अपनी नई नई लग्जरी कारों से कलेक्टर महोदय की भांति बड़े ठाठ से जमीन पर पैर रखते हैं अब यह सारे ठाठ कहां से आए यह तो अधिकारी ही जाने परंतु हम भी क्या करें पत्रकार हैं जो हमें दिखाई देता है उसको हम लिखित भाषा में परोस देते हैं अब इसमें कई लोगों को तो मिर्ची भी लग जाती है और कई लोग सोचते होंगे कि इस व्यक्ति का हम क्या करें मगर मजबूरी यह है कि बेचारे बस सोचते ही रहते हैं बाकी यह भी देखा गया है कि पत्रकारों के विज्ञापन के पैसे के लिए पत्रकारों को इनके आगे पीछे और इनके बताएं समय पर चक्कर काटने पड़ते हैं अब चुनाव आ गए हैं तो प्रत्याशी वोटरों को खुश करने के लिए उनके घर तो जाना ही पड़ेगा विनती भी करनी पड़ेगी अनुरोध और शाम दाम दंड भेद सारी नीतियां अपनानी पड़ेगी परंतु बेचारे सोचते होंगे कि विकास कार्यों का पूछे तो हम क्या कहेंगे मगर मजबूरी है कि भाई चुनाव भी जीतना है इसीलिए दंडवत भी करना पड़ेगा और सब कुछ सहना एवं सुनना भी पड़ेगा हां इसके बाद अगर जीत गए तो फिर देखेंगे फिर से सचिव कलेक्टर बन जाएंगे एवं सरपंच राष्ट्रपति अब देखते हैं नामांकन दाखिल करने वाले प्रत्याशी किन-किन तरीकों से जनता को लुभाते हैं और कैसे चुनाव जीत पाते हैं यह तो समय ही बताएगा और हारे हुए सरपंच पंच पत्रकारों के पास अपनी पीड़ा ए लेकर आएंगे और जीते हुए सरपंच की पोल खोलेंगे और कहेंगे की इसको सबक सिखाओ मगर दोस्तों पत्रकार इतना खुदगर्ज नहीं है कि किसी के कहने में आकर कुछ भी कर बैठे इन हारे हुए सरपंचों को शर्म आनी चाहिए कि जब आमने सामने की टक्कर हो रही थी तो अगर अपन हार गए तो घर में रजाई ओढ़ कर सो जाए मगर ऐसा नहीं होता है प्राप्त जानकारी के अनुसार यह भी जनता जनार्दन आवाज कर रही है कि अगर पूर्व सरपंच या सरपंच प्रतिनिधि सरपंच के लिए फार्म भरते हैं तो उनको यह एहसास कराएंगे की हमारे काम के कितने कितने रुपए आपने डकारे हैं स्वच्छता अभियान मनरेगा योजना के तहत सरपंच सचिव और सहायक सचिव ने कितनी कितनी धनराशि जमा करी है अब देखना है कि पूर्व सरपंच कितने प्रतिशत वह या उनके प्रतिनिधि जो फार्म भर रहे हैं जीत पाते हैं या नहीं हमारी टीम पहुंचेगी हरगांव के अंदर और जनता जनार्दन से करेगी सवाल कि इन 8 सालों में तुम्हारे गांव के अंदर कितना हुआ है विकास और इंदिरा आवास मुख्यमंत्री आवास एवं पी एम आवास के नाम से किस-किस ने लिए है कितने कितने रुपए हमारी टीम हो गई है सक्रिय

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