गरीबी और पेट की भूख मजदूरों को =मायानगरी मुम्बई खींच लाई थी।

“जिंदा रहे तो फिर आऐंगे = मुम्बई से भागते मजदूर!”

भोपाल। (कबीर मिशन पत्रिका – मूलचंद मेंधोनिया सहसंपादक भोपाल) बस अभी 3-4 माह ही बीते होंगे कि फिर मौत पीछे पड़ी है। लाखों मजदूर देश के विभिन्न शहरों और महानगरों में अपने गांव घर – वार व परिवार को छोड़कर पेट की भूख मजदूरी कर रुपये कमाने को मजदूरी करते हैं। अभी कुछ महीने ही सुकून मिला होगा कि लाक डाउन के लगते और सुनने मात्र से मजदूर जन शहरों से ट्रेनों में खचाखच भराकर गांव लोटने लगे हैं। आखिर रोज मजदूरी करने वाले गरीबों के पीछे कोरोना सबसे अधिक परेशान कर रहा है।
गरीबों को दो वक्त के निवाले तक खाने नहीं दे रहा है। जबकि अमीर लोग, नेतागण, अधिकारी बन्धुगण और सम्पन्न लोग मौज कर रहे हैं। वहीं इस देश श्रमिक भाई जो भवन निर्माण में नियोजित कर्मकार है, हजारों सीजन के व्यवसायी, ठेले / गुमठी वाले, फल, सब्जी और कपड़े वाले, रसोई, किराने वाले, फूट पाथ पर आवश्यक घरेलू बाजार में सामग्री जो सबको जरूरी है। तथा लाईट वाले, बर्तन, फर्नीचर, फूल माली, पार्लर, हेयर सेलून, व अन्य छोटे कामकाजी /व्यवसायी समेत मजदूर भाईयों को लाक डाउन से अत्यंत दुखदाई सामना करना पड़ता है। वहीं इस देश के नेता चुनाव में बड़ी – बड़ी आमसभा कर रहे है। देश के करोड़ों गरीबों के खून पसीना की कमाई जो कि वह सैकड़ों टैक्स के रूप में देता है। उस रुपये को चुनाव में झोंक कर बर्बाद किया जा रहा है। कोरोना के नाम पर लूटपाट पुलिस और चिकित्सालय में जन चर्चा बनी हुई है। सोशल मीडिया पर अनेक मामले सामने आ रहे है। ये क्रत्य मानवीयता को तार – तार कर दिया है। देश के इतिहास को कभी तानाशाह के और गरीब मजलूमों को तंग करने के नाम से जाना जायेगा। मजदूरों की किसी को फिक्र ही नहीं है कि वह पेट की आग बुझाने के लिए क्या करेंगे। कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। यह सब सोचने पर मजबूर होगें, मजदूर भाई मुम्बई मायानगरी ही गये थे कि मजदूर वहां से भागना पड रहा है। ऐसा ही कोहराम देश के हर बड़े शहरों में चल रहा है। जहां चुनाव है, वहां कोरोना चुनाव करा रहा है। वहां धन, दौलत सब लुटाई जा रही जबकि उस धन की आवश्यकता देश के गरीब मजदूरों के लिए थी। वाह रे! कोरोना तू कब भागेगा, तु गरीबों को सता रहा है।

Leave a Reply