वैक्सीन है या चूं-चूं का मुरब्बा ?

मौत की चादर कमर तक ओढ़कर बैठे भारत में सबका अपना लोकतंत्र है ,सबका यानि सबका.प्राणवायु बनाने वालों का,वैक्सीन बनाने वालों का,सियासत करने व
मौत की चादर कमर तक ओढ़कर बैठे भारत में सबका अपना लोकतंत्र है ,सबका यानि सबका.प्राणवायु बनाने वालों का,वैक्सीन बनाने वालों का,सियासत करने वालों का,ब्लैकमेलरों का .शायद यही वजह है की इस देश में कोरोना वैक्सीन एक है और दाम तीन .वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां वैक्सीन के दाम खुद तय कर रहीं हैं और सरकार गुड़ खाकर बैठी या खड़ी तमाशा देख रही है .जन स्वास्थ्य सरकार का जैसा दायित्व है ही नहीं.
भारत में कोरोना वैक्सीन निर्माता कंपनी भारत बायोटेक ने रातों-रात घोषणा कर दी है की उसकी वैक्सीन केंद्र सरकार,राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों को अलग-अलग दामों पर मिलेंगीं .. कंपनी के अनुसार, कोवैक्सीन की एक डोज के लिए राज्य सरकार और प्राइवेट अस्पतालों को अलग-अलग कीमतें देनी होंगी. राज्य सरकार को जहां वैक्सीन की एक डोज 600 रुपये में पड़ेगी, वहीं प्राइवेट अस्पतालों को एक डोज के 1200 रुपये देने होंगे.
गौर करने की बात ये है कि इस वैक्सीन के आयात शुल्क 15 से 20 डॉलर रखी गई है. कंपनी का कहना है कि ये कीमत अभी भी अन्य मेडिकल ट्रिटमेंट और कोरोना मरीजों के इलाज में जरूरी सेवाओं के लिहाज से काफी कम है. मजे की बात ये है कि प्राइवेट कंपनी को वैक्सीन प्रोडक्शन का सिर्फ लिमिटेड स्टॉक ही सप्लाई किया जाएगा. बाकी वैक्सीन सरकारी अस्पतालों में डिलिवर होंगी.
आपदा को अवसर समझने वाली मानसिकता का ये एक ताजा उदाहरण है. आपको याद होगा कि पहले सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने कोविशील्ड वैक्सीन की कीमत राज्य सरकारों के 400 रुपये प्रति डोज और प्राइवेट अस्पतालों के लिए 600 रुपये प्रति डोज देनी की बात कही थी. जिस पर विवाद खड़ा हो गया था. इसके बाद कंपनी ने सफाई पेश करते हुए कहा था शुरुआती कीमत एडवांस फंडिग पर आधारित थी, लेकिन अब उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए और अधिक इनवेस्ट करने की जरूरत है. इसलिए वैक्सीन के दाम डेढ़ गुना बढ़ाए जाएंगे और जल्द की नई कीमतों का ऐलान कर दिया जाएगा.
भारत में अब जबकि रोजाना तीन से साढ़े तीन लाख नए कोरोना मरीज निकल रहे हैं तब ये सब किसी तमाशे से कम नहीं हैं.भारी आलोचनाओं के बाद सरकार ने वैक्सीनेशन की उम्र सीमा घटाई है .देशभर में कोरोना वैक्सीनेशन के तीसरे चरण की शुरुआत 1 मई से होने जा रही है. इसके तहत 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाई जाानी है. इसके लिए रजिस्ट्रेशन आज यानी 24 अप्रैल से शुरू हो गए हैं. इसी बीच वैक्सीन निर्माता कंपनियों ने एक डोज की कीमत का ऐलान किया है. हालांकि कुछ राज्य सरकारों ने तीसरे चरण में निशुल्क वैक्सीनेशन का ऐलान किया है. लेकिन बाकी राज्यों में जनता को अपनी जेब से पैसे देकर वैक्सीन लगवानी होगी.
आंकड़ों के हिसाब से देखा जाये तो भारत में कोई 90 करोड़ की आबादी ऐसी है जिसे कोरोना का टीका लगाया जाना है. इसमें से कोई 15 करोड़ से अधिक लोग 18 वर्ष के ऊपर के हैं .यानि इस हिसाब से अभी हमारे देश में टीकाकरण के लिए लम्बी आबादी बाक़ी है और सबको टीका मिलने में शायद एक-दो साल से ज्यादा समय लग जाये. .कायदे से तो इस अक्लाप्निक विपदा के समय कोरोना के टीकों की सम्पूर्ण व्यवस्था सरकार को करना चाहिए थी लेकिन ऐसा ह नहीं रहा. सरकार को राज्यों के साथ राजनीति भी करना है और देश के असंख्य निजी अस्पताल वालों का पे भी पालना है इसीलिए सरकार ने एक ही वैक्सीन के तीन दाम स्वीकार कर लिए हैं .साफ़ तौर पर ये भ्र्ष्टाचार का मामला है .
यदि कोई वैक्सीन केंद्र के पास 150 रूपये की मिलेगी और राज्यों के पास 600 की तो मानकर चलिए की इस बेईमान मानसिकता वाले देश में ये टीके निजी अस्पतालों तक पिछले दरवाजे से पहुँच कर सेवा शुल्क समेत 1500 रूपये का मिलेगा .जनता को यदि अपनी जान बचना हो तो वो कहीं से भी व्यवस्था कर और टीका लगवाए .जब तक देश में वैक्सीन का एक दाम नहीं होगा तब तक न इसकी कालाबाजारी रुकेगी और न नकल ..हमारा अनुभव कहता है कि भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में लाश का मांस नोंचकर खाने वाले लोग ज्यादा हैं ,सेवाभावी कम .खुद सरकार आपदा के समय नाकाम साबित हुई है.सरकार के पास दवाएं तो छोड़िये प्राणवायु तक नहीं है .
आशंका और संदेह की नींव साफ़ दिखाई दे रही है. जो कम्पनी केंद्र को 150 रूपये में वैक्सीन दे रही है ,जाहिर है की उसकी लागत इससे भी कम होगी ,फिर इसी वैक्सीन को तीन गुने दाम पर राज्यों को बेचने और निजी अस्पतालों को दस गुना ज्यादा दाम पर बेचने की छूट बिना वजह तो नहीं मिली होगी.कोई न कोई दुरभि संधि सरकार और वैक्सीन उत्पादकों के बीच जरूर हुई है .आक्सीजन के मुद्दे पर सरकार के कान उमेठने वाला सुप्रीम कोर्ट भी इस विसंगति के बारे में स्वयं संज्ञान आखिर कैसे ले ?धंधे का मामला है .दाम नियंत्रण का कोई नियमक संस्थान हिन्दुस्तान में यदि होता तो क्या मजाल था की एक ही चीज की तीन दरें तय की जातीं ?
भारत दुनिया का बहु बड़ा बाजार है .यहां यदि केवल आआआआइक्सिन की ही बात करें तो इतनी खुराकें चाहिए जितने में कि अनेक देशों का काम चल जाएगा,ऐसे में कौन मूर्ख होगा जो मुनाफे का मौक़ा छोड़ दे ,वो भी तब भारत में एक ऐसी सरकार हो जो मानती हो की व्यापार करना सरकार का काम नहीं है .सरकार का काम न जन जीवन की सुरक्षा करना है .सरकार का काम लूट के अवसर प्रदान करना है. सरकार ने पिछले साल 20 लाख करोड़ का पॅकेज देकर अकेले डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़कर 21 लाख करोड़ कमा लिए तो वैक्सीन तो उससे कहीं ज्यादा कमाने का अवसर देने वाली है. वैक्सीन तो हर आदमी को चाहिए चाहे वो कार वाला हो या पैदल .
भारत की जनता भेद है,उसे आप चाहे जब और चाहे जैसे और चाहे जितना मूंड सकते हैं .बेचारी मिमियाकर रह जाती है. उसकी सुरक्षा न संविधान करता है न संसद .न्यायपालिका भी हवा-हवाई बातें कर अपना दायित्व पूरा कर लेती है .ये मौक़ा है जब लोकतंत्र की रक्षा के लिए समर्पित हर संस्था और व्यक्ति सरकार से ये सवाल करे की एक वैक्सीन के तीन दाम क्यों ?देश को अब्बल तो निशुल्क वैक्सीन मिलना चाहिए और यदि ऐसा करने का दिल-गुर्दा नहीं है तो सबको 150 रूपये में ही वैक्सीन मिलना चाहिए .देखिये आने वाले दिनों में कितने कांग्रेसी,कितने वामपंथी,कितने समाजवादी और कितने शहरी नकसली इस मुद्दे पार सड़कों पर आकर सरर को घेर पाते हैं ?हम जैसे अदने से लेख तो अपनी लक्ष्मण रेखाओं में अपना काम कर ही रहे हैं .सवाल पूछ कर .क्योंकि हमें लगता है की आआआआइक्सिन चूं-चूं का मुरब्बा नहीं बल्कि जीवनदायनी द्रव्य है .भारत ,अमेरिका नहीं है ,यहां मुफ्त आआआआआइक्सिन लगाने वाले निजी अस्पताल भी शून्य राशि की रसीद देते हैं .भारत में तो ये सम्भव ही नहीं है .वहां सरकार कि डेढ़ सौ की वैक्सीन निजी अस्पताल तक पहुँचते -पहुंचते एक हजार नहीं तो आठ सौ रूपये तो कमा ही लेगी.

Leave a Reply